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मीडिया ट्रायल पर सुप्रीम कोर्ट ने कह दी ऐसी बात, जानकर लग जाएगी मिर्ची

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर तुरंत वीडियो अपलोड करने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई है. साथ ही अदालत ने चेतावनी दी है कि इस तरह की प्रथाओं से निष्पक्ष सुनवाई की पवित्रता खतरे में पड़ सकती है.

यह मामला शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया. सुप्रीम कोर्ट हेमेंद्र पटेल द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पुलिस आरोपियों के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड करती है, जिससे लोगों के मन में पूर्वाग्रह पैदा होता है.

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि इस मुद्दे में पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल का इस्तेमाल उन लोगों के नाम और चेहरे दिखाने के लिए किया जा रहा है जिन्हें वे आरोपी होने का दावा करते हैं. शंकरनारायणन ने कहा ने कहा कि, यह देश भर में कहीं भी मौजूद आरोपियों के अधिकारों का अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन है. उन्होंने कहा कि, उनके पास ऐसे उदाहरण हैं जहां न केवल तस्वीरें हैं, बल्कि पुलिस द्वारा उन्हें रस्सियों, हथकड़ियों आदि के साथ घुमाया जा रहा है. उन्होंने ऐसी तस्वीरें और वीडियो वाली एक पेन ड्राइव भी स्टोर की है.

वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि ऐसे कई मामले होते हैं जिनमें हर कोई सवाल उठाता है कि अदालतें ऐसे लोगों को जमानत क्यों देती हैं, या पुलिस के आधिकारिक हैंडल पर पोस्ट की गई तस्वीरों के बावजूद उस व्यक्ति को बरी क्यों किया गया. बेंच ने कहा कि पुलिस विभाग का आधिकारिक हैंडल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए पुलिस की कार्यप्रणाली की जानकारी का जरिया है.

याचिका में यह तर्क दिया गया कि अदालत ने एक अन्य मामले में राज्यों को पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशानिर्देश बनाने को कहा था, जिसमें सोशल मीडिया पोस्ट भी शामिल हों. बेंच ने याचिकाकर्ता को उन दिशानिर्देशों के परिणाम की प्रतीक्षा करने का सुझाव दिया और शंकरनारायणन से सहमति जताते हुए कहा कि आज मोबाइल फोन रखने वाला हर व्यक्ति मीडिया बन गया है.

पीठ ने वकील से कहा कि पुलिस पर ही ध्यान केंद्रित करने के बजाय जिन्हें मीडिया ब्रीफिंग के लिए मानक संचालन प्रक्रिया बनाने के लिए पहले ही तीन महीने का समय मिल चुका है उन्हें एक व्यापक ढांचे पर जोर देना चाहिए जिसमें पुलिस, पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया सभी शामिल हों.

बेंच ने निष्पक्ष सुनवाई के व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस मामले को देखा और कहा, “हम समझते हैं कि पुलिस द्वारा मीडिया को दी जाने वाली जानकारी जिम्मेदार और तर्कसंगत होनी चाहिए… ताकि किसी भी प्रकार का पूर्वाग्रह न दिखे क्योंकि आपराधिक न्याय प्रणाली में जांच एजेंसी न तो पीड़ित के पक्ष में होती है और न ही आरोपी के पक्ष में.”

बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. बेंच ने कहा, “संतुलन बनाए रखने के लिए, नियमावली पुलिस को ऐसे अति उत्साही बयान देने से रोकेगी जिनसे निष्पक्ष और न्यायसंगत निर्णय के अधीन अपराध का अनुमान लगाया जा सके.” जस्टिस बागची ने कहा, “क्या होगा जब इस तरह की प्रक्रिया… तीसरे पक्ष और पक्षपाती मीडिया द्वारा बनाए गए संशय या दूषित वातावरण को दूर करने में सक्षम नहीं होती, जो मनगढ़ंत कहानियां गढ़ते रहते हैं. इससे मीडिया ट्रायल हो सकता है, जो कानून के शासन को पूरी तरह से नकार देता है.”

सीजेआई ने कहा कि दुनिया का सबसे व्यस्त व्यक्ति भी स्कूटर या कार रोककर वीडियो बनाने के लिए वाहन से बाहर निकल जाएगा. “जब कोई व्यक्ति मौत की गुहार लगा रहा हो, तो कोई उसकी मदद नहीं करेगा. लोग वीडियो बनाने के लिए मोबाइल फोन निकाल लेंगे.”

लोगों के वीडियो बनाने पर सीजेआई ने कहा कि, सड़क दुर्घटनाओं में लोग मर रहे हैं… संवेदनशीलता का यही स्तर है. अब सवाल यह है कि इन्हें कैसे नियंत्रित किया जाए.” शंकरनारायणन ने कहा कि आज की समस्या यह है कि हर कोई मीडिया है और मोबाइल फोन रखने वाला हर व्यक्ति मीडियाकर्मी है. उन्होंने पूछा, “अब हम इसे कैसे नियंत्रित करें.” वकील ने जोर दिया कि याचिका का संकीर्ण दायरा केवल पुलिस पर केंद्रित है.

बेंच ने कहा, “तुलनात्मक रूप से, टीवी चैनल कहीं अधिक संयमित हैं, भले ही कोई उनके विचारों से असहमत हो.” शंकरनारायणन ने बताया कि ‘मीडिया ट्रायल’ का मुद्दा सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के सहारा बनाम एसईबीआई मामले में उठाया था. बेंच ने कहा कि, चिंता का विषय मीडिया ब्रीफिंग के दौरान पुलिस अधिकारियों का अति सक्रिय होना और लंबित आपराधिक मामलों में मीडिया ट्रायल के बढ़ते खतरे हैं.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि सोशल मीडिया पर ऐसे टैब्लॉइड मौजूद हैं जो ‘ब्लैकमेलर’ की तरह काम करते हैं. उन्होंने कहा, “कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म हैं जो केवल वर्चुअल रूप से मौजूद हैं, और वे ब्लैकमेलर हैं. ब्लैकमेल कहना तो बहुत कम होगा.”

बेंच ने टिप्पणी की, “समस्या खंडित सोशल मीडिया है.” मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा, “यह डिजिटल गिरफ्तारी के समान है या उससे अलग एक पहलू है.” बेंच ने यह भी पाया कि राष्ट्रीय राजधानी से दूर कस्बों और शहरों में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि लोग मीडियाकर्मी होने का दिखावा करते हैं और अपने वाहनों पर इसे खुलेआम प्रदर्शित करते हैं, ताकि वे अपने स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल कर सकें.

शंकरनारायणन ने कहा कि वे कुछ ऐसे वकीलों को जानते हैं जो राजमार्गों पर टोल से बचने के लिए अपनी कारों पर ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट’ के स्टिकर लगाते हैं. बेंच ने कहा कि चूंकि निष्पक्ष सुनवाई के सवाल के लिए व्यापक परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता है, इसलिए याचिकाकर्ता के लिए फिलहाल याचिका वापस लेना और अप्रैल के बाद, जब मीडिया ब्रीफिंग पर पुलिस दिशानिर्देश या मानक प्रक्रिया लागू हो जाएगी, तब विस्तारित दायरे के साथ इसे फिर से दायर करना अधिक उचित होगा. इस पर शंकरनारायणन ने याचिका वापस लेने पर सहमति जताई.

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