जांजगीर-चांपा/पंतोरा। ब्रज की मशहूर लट्ठमार होली की तरह छत्तीसगढ़ के पंतोरा गांव में भी एक अनोखी परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। यहां रंग पंचमी के अवसर पर मनाई जाने वाली ‘डंगाही होली’ में कुंवारी कन्याएं लाठियां बरसाती हैं। खास बात यह है कि इस अनूठी रस्म की शुरुआत गांव के मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं को प्रतीकात्मक लाठी मारकर की जाती है।
देवताओं से शुरू होती है ‘मार’ की परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, इस परंपरा का क्रम बेहद खास है-
- बांस की छड़ियों की तैयारी: मड़वा रानी के जंगलों से पतली बांस की छड़ियां (डंगाही) लाई जाती हैं।
- नौ कन्याओं का पूजन: मां भवानी मंदिर में 9 कुंवारी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर पूजा की जाती है।
- प्रतीकात्मक प्रहार: पूजा के बाद कन्याएं मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों पर पांच-पांच बार प्रतीकात्मक लाठी चलाती हैं।
मान्यता है कि इससे देवता जागृत होते हैं और पूरे गांव की रक्षा करते हैं।
लाठी की ‘मार’ को मानते हैं आशीर्वाद
देवताओं से रस्म पूरी होने के बाद कन्याओं की टोली पूरे गांव में निकलती है। गांव के लोग खुशी-खुशी लाठी की मार खाते हैं। लोग इसे ‘प्रसाद’ और माता रानी का आशीर्वाद मानते हैं। कन्याओं पर गुलाल छिड़ककर सम्मान किया जाता है। गांव से गुजरने वाले राहगीर भी रुककर इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस रस्म से चर्म रोग, हैजा और अन्य बीमारियां दूर रहती हैं।
300 साल पुरानी आस्था की कहानी
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि सदियों पहले यहां भीषण महामारी फैली थी। तब गांव के मालगुजार को स्वप्न में माता रानी ने दर्शन देकर कुंवारी कन्याओं से लाठी चलवाने की परंपरा शुरू करने का संकेत दिया था। तब से हर वर्ष रंग पंचमी पर यह आयोजन किया जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि तब से गांव में कोई बड़ी महामारी नहीं फैली।
आस्था और परंपरा का संगम
पंतोरा की ‘डंगाही होली’ सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि ग्रामीण आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। जहां एक ओर लोग लाठी की मार को आशीर्वाद मानते हैं, वहीं दूसरी ओर यह परंपरा 300 वर्षों से गांव की पहचान बनी हुई है। रंग पंचमी के दिन पंतोरा गांव श्रद्धा, उल्लास और अनूठी परंपरा का जीवंत उदाहरण बन जाता है।









