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टैक्स की नई ‘पहेली’! 1 अप्रैल से होने वाले ये 10 बदलाव बदल देंगे आपका बजट

सरकार ने इनकम-टैक्स नियम, 2026 को नोटिफाई कर दिया है. ये नियम 1 अप्रैल से लागू होंगे और इनसे यह तय होगा कि नया इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 जमीनी स्तर पर कैसे काम करेगा. ये नियम सिर्फ मोटे-मोटे प्रावधानों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें वे सटीक फॉर्मूले, लिमिट्स और रिपोर्टिंग की जरूरतें भी बताई गई हैं जिनका पालन टैक्स देने वालों, कंपनियों और टैक्स अधिकारियों को करना होगा. बड़े स्तर पर देखें तो यह सरकार की उस कोशिश का हिस्सा है जिसके तहत वह पुराने इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 की जगह एक ज्यादा आसान और आधुनिक कानून लाना चाहती है, जो आज की डिजिटल इकोनॉमी को दिखाता हो.

इसका मकसद साफ है – हिसाब-किताब को एक जैसा बनाना, डाटा की ज्यादा सख्त ट्रैकिंग करना और अस्पष्टता (grey areas) को कम करना. ये नियम टेक्नोलॉजी पर बेस्ड टैक्स पालन की ओर भी एक बदलाव दिखाते हैं, जहां ट्रांजेक्शन का एक रिकॉर्ड (trail) रह जाता है और टैक्स लगाना अब ज्यादातर फॉर्मूले पर बेस्ड होता है, न कि किसी की अपनी सोच पर. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर टैक्स रिलेटिड वो कौन से 10 बदलाव होने जा रहे हैं, जो आपके बजट को पूरी तरह से बदल सकते हैं…

डिजिटल बिजनेसेस पर अब भारत में मौजूद न होने पर भी टैक्स लग सकता है
सबसे बड़े बदलावों में से एक का मकसद दुनिया भर की डिजिटल कंपनियों पर है. नियमों के मुताबिक, अगर किसी ऐसे व्यक्ति (non-resident) को भारत के यूजर्स से मिलने वाला पेमेंट 2 करोड़ रुपए से ज्यादा हो जाता है, या अगर उस प्लेटफॉर्म के भारत में 3 लाख यूज़र्स हैं, तो उस पर भारत में टैक्स लगाया जा सकता है. इसका मतलब है कि जो कंपनियां ऑनलाइन सर्विसेज, ऐप्स या डिजिटल प्रोडक्ट देती हैं, वे अब भारत में अपना कोई ऑफिस न होने पर भी भारत के टैक्स दायरे में आ सकती हैं.

अगर इनकम साफ न हो तो टैक्स अधिकारी को ज्यादा अधिकार मिलेंगे
जिन मामलों में किसी ऐसे व्यक्ति (non-resident) की इनकम साफ तौर पर तय नहीं की जा सकती, वहां नियम अधिकारी को अलग-अलग तरीकों से इनकम का हिसाब लगाने की इजाजत देते हैं — इनमें टर्नओवर का एक तय प्रतिशत या “कोई भी दूसरा तरीका शामिल है जिसे असेसिंग ऑफिसर सही समझे. हालांकि इससे टैक्स अधिकारियों को मुश्किल मामलों से निपटने में मदद मिलती है, लेकिन इससे उनके अपने फ़ैसले लेने का अधिकार भी बढ़ जाता है, जिससे ज्यादा विवाद हो सकते हैं.

शेयर बाजार के ट्रांजेक्शन पर नजर
शेयर बाजारों को अब शेयरों की खरीद-बिक्री (trades) का पूरा ऑडिट रिकॉर्ड रखना होगा और लेन-देन का डेटा सात साल तक संभालकर रखना होगा. उन्हें किसी भी बदलाव की जानकारी भी नियमित रूप से देनी होगी. इस कदम का मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और यह पक्का करना है कि किसी भी संदिग्ध लेन-देन का आसानी से पता लगाया जा सके.

भारत से जुड़े विदेशी सौदों पर टैक्स लगाने का साफ फॉर्मूला
नियमों में एक तय फॉर्मूला बताया गया है, जिससे उन विदेशी शेयर ट्रांसफर से होने वाली इनकम का हिसाब लगाया जा सके, जिनका मूल्य भारत में मौजूद संपत्तियों से जुड़ा होता है. यह बात इसलिए अहम है क्योंकि पहले ऐसे सौदों पर अक्सर विवाद होते थे. उम्मीद है कि फॉर्मूले पर आधारित इस तरीके से अलग-अलग देशों के बीच टैक्स लगाने से जुड़ी अस्पष्टता कम होगी.

शेयरों के वैल्यूएशन के नियम ज्यादा व्यवस्थित होंगे
नए नियम साफतौर पर बताते हैं कि उचित बाजार मूल्य (FMV) की कैलकुलेशन कैसे की जानी चाहिए:
लिस्टेड शेयरों का वैल्यूएशन बाजार कीमतों के आधार पर किया जाएगा
अनलिस्टेड शेयरों के लिए मर्चेंट बैंकर जैसे विशेषज्ञों द्वारा वैल्यूएशन की आवश्यकता होगी
इससे एकरूपता आएगी, लेकिन कंपनियों के लिए कंप्लायंस की जरूरतें भी बढ़ेंगी.
टेक-होम सैलरी पर असर
कर्मचारी बेनिफिट्स पर टैक्सेशन का एक्सप्लेन किया है. उदाहरण के लिए:
मकान किराए का इवैन्यूएशन अब शहर की आबादी पर निर्भर करेगा.
फ्री मील केवल 200 रुपए प्रति भोजन तक ही टैक्स फ्री होगा.
₹15,000 से ज्यादा के गिफ्ट टैक्सेबल होंगे.
ये बदलाव सैलरी स्ट्रक्चर और उस पर लगने वाले टैक्स के तरीके में थोड़ा बदलाव ला सकते हैं.
इंप्लॉयर से मिलने वाले लोग अब कम टैक्स फ्रेंडली होंगे
यदि कोई कर्मचारी इंप्लॉयर से रियायती या ब्याज-मुक्त लोन लेता है, तो अब इस लाभ की गणना भारतीय स्टेट बैंक की लोन रेट के आधार पर की जाएगी. इससे ऐसे लोन पर पहले की तुलना में कर लगने की संभावना बढ़ जाएगी.

ESOP टैक्सेशन के नियम ज्यादा स्पष्ट हो गए हैं
स्टॉक ऑप्शन प्राप्त करने वाले कर्मचारियों के लिए, नियम यह परिभाषित करते हैं कि शेयर का मूल्य कैसे निर्धारित किया जाना चाहिए:
लिस्टेड कंपनियों के लिए बाजार मूल्य
अनलिस्टेड कंपनियों के लिए मर्चेंट बैंकर द्वारा वैल्यूशएशन
इससे भ्रम दूर होता है, विशेष रूप से स्टार्टअप कर्मचारियों के लिए.
खर्चों की अस्वीकृति के लिए सरल लेकिन कड़े नियम
टैक्स फ्री इनकम से संबंधित खर्चों में अब ये शामिल होंगे:
प्रत्यक्ष खर्च
साथ ही औसत निवेश मूल्य का 1 फीसदी
हालांकि यह नियम लागू करना आसान है, लेकिन कुछ मामलों में इससे अस्वीकृति की मात्रा बढ़ सकती है.
जीरो कूपन बॉन्ड के लिए कड़ी शर्तें
नियम जीरो कूपन बॉन्ड जारी करने के मानदंडों को और कड़ा करते हैं. इन बॉन्ड में ये विशेषताएं होनी चाहिए:

मैच्योरिटी अवधि 10 से 20 वर्ष होनी चाहिए
निवेश-योग्य (investment-grade) रेटिंग होनी चाहिए
फंड्स के उपयोग के लिए निर्धारित समय-सीमा का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए
इससे लॉन्गटर्म इंफ्रा फंडिंग साधनों का बेहतर रेगुलेशन होता है.

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