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छात्रों के उतरवाए जनेऊ से खड़ा हुआ विवाद, जानें यज्ञोपवीत के कितने सख्त होते हैं नियम

Yagnopavit Significance: कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के कृपा निधि कॉलेज में हालही में CET परीक्षा के दौरान पांच छात्रों को जनेऊ यानी यज्ञोपवीत उतारने के लिए मजबूर किया गया. छात्रों ने आरोप लगाया कि मडिवाला स्थित कॉलेज के परीक्षा हॉल में मौजूद निरीक्षकों ने उनसे कहा कि यदि वे परीक्षा देना चाहते हैं, तो उन्हें अपना जनेऊ उतारना होगा. अब इस मामले पर विवाद हो रहा है, ऐसे में आइए जानते हैं कि जनेऊ को उतारने और पहनने को लेकर क्या नियम हैं?

हिंदू परंपरा में जनेऊ का बहुत पवित्र स्थान है. उपनयन संस्कार को 16 संस्कारों में से एक जरूरी संस्कार बताया गया है. उपनयन संस्कार के माध्यम से ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इसे धारण करते हैं. जनेऊ केवल एक धागा नहीं है, बल्कि यह एक दिव्य यंत्र है जो धारण करने वाले को उसके कर्तव्य और अनुशासन की याद दिलाता है.

जनेऊ हर जगह क्यों नहीं उतारना चाहिए?
आमतौर पर एक बार यज्ञोपवीत धारण करने के बाद उसे शरीर से नहीं उतारना चाहिए. यद्यपि, कुछ परिस्थितियों में पुराने यज्ञोपवीत को नए से बदलना आवश्यक हो जाता है. श्रावण माह की पूर्णिमा के दिन प्रतिवर्ष नया यज्ञोपवीत धारण करना जरूरी है. इसके अतिरिक्त, घर में जन्म या मृत्यु होने पर और सूतक काल समाप्त होने पर, ग्रहण काल ​​समाप्त होने पर, रंग फीका पड़ने पर जनेऊ बदला जाता है. ध्यान देने योग्य बात यह है कि पुराने यज्ञोपवीत को नए यज्ञोपवीत को धारण करने के बाद ही उतारना चाहिए. उपनयन संस्कार प्राप्त व्यक्ति को एक क्षण के लिए भी जनेऊ के बिना नहीं रहना चाहिए.

जनेऊ पहनने वाले के लिए होते हैं सख्त नियम
जनेऊ धारण करने और उसकी देखभाल करने के कुछ सख्त नियम हैं. पेशाब या शौच करते समय जनेऊ को दाहिने कान पर धारण करना चाहिए. पूजा, हवन, वेद अध्ययन और संध्या वंदना के दौरान जनेऊ धारण करना अनिवार्य है. पुराने जनेऊ को बदलते समय उसे फेंकना या कहीं जलाना नहीं चाहिए. इसके बजाय उसे बहते पानी या किसी पवित्र जल सोर्स में विसर्जित कर देना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार, जनेऊ हमेशा नाभि के स्तर पर होना चाहिए, न तो बहुत नीचे और न ही बहुत ऊपर.

नया जनेऊ पहनते समय दिशा का रखें ध्यान
नया यज्ञोपवीत धारण करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए और संकल्प लेना चाहिए. इस समय ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्, आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः मंत्र का जाप करें और दाहिने हाथ को बाएं कंधे से नीचे लाते हुए इसे धारण करें. हर बार नया यज्ञोपवीत धारण करते समय मंत्र का जाप और आचमन करना आवश्यक है. इस अनुष्ठान के बाद कम से कम 10 या 28 बार गायत्री मंत्र का जाप और संध्या वंदन करने से यज्ञोपवीत में पूर्ण शक्ति आती है.

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