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43 साल बाद छत्तीसगढ़ लौटेगी ‘अवलोकितेश्वर’ की दुर्लभ प्रतिमा; अमेरिका में हुई थी बरामद, कीमत ₹19 करोड़ से अधिक

रायपुर, 18 मई। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए एक ऐतिहासिक सफलता सामने आई है। महासमुंद जिले के प्राचीन बौद्ध स्थल ‘सिरपुर’ से प्राप्त और करीब 43 वर्ष पहले रायपुर के संग्रहालय से चोरी हुई दुर्लभ अवलोकितेश्वर कांस्य प्रतिमा जल्द ही छत्तीसगढ़ वापस लाई जाएगी। अमेरिका में बरामदगी के बाद भारत सरकार को सौंपी जा चुकी इस बहुमूल्य प्रतिमा की घर वापसी के लिए राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस ऐतिहासिक प्रतिमा की कीमत लगभग दो मिलियन डॉलर (भारतीय मुद्रा में करीब 19 करोड़ 19 लाख 41 हजार रुपये) आंकी गई है।


प्रशासनिक प्रक्रियाएं तेज, लेने जाएगी राज्य की टीम

पुरातत्व एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि इस बहुमूल्य धरोहर को वापस राज्य में लाने के लिए भारत सरकार के साथ औपचारिक पत्राचार तेजी से जारी है। केंद्र सरकार से अंतिम अनुमति और आवश्यक दिशा-निर्देश मिलते ही छत्तीसगढ़ सरकार की एक विशेष टीम प्रतिमा को ससम्मान वापस लाने के लिए रवाना होगी।


सिरपुर की प्राचीन बौद्ध विरासत का प्रतीक: शिल्पी द्रोणादित्य की कलाकृति

विशेषज्ञों के अनुसार, यह कांस्य प्रतिमा सिरपुर की समृद्ध बौद्ध कला और उन्नत शिल्प परंपरा का एक जीवंत और बेजोड़ उदाहरण है:

  • खोज: वर्ष 1939 में सिरपुर के प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर परिसर के पास कांस्य प्रतिमाओं का एक बड़ा भंडार मिला था, जिसमें यह प्रतिमा भी शामिल थी।
  • शिल्पकार: प्रतिमा पर उत्कीर्ण शिलालेख के अनुसार, इसका निर्माण सिरपुर के तत्कालीन प्रसिद्ध शिल्पकार ‘द्रोणादित्य’ ने किया था।
  • संग्रहण: खोज के बाद इसे सुरक्षित रखने के लिए रायपुर स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में संरक्षित किया गया था।

संग्रहालय से चोरी, तस्करी और फिर न्यूयॉर्क में जब्ती का सफर

इस अमूल्य प्रतिमा के गायब होने और दोबारा मिलने की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी है:

  1. 1982 (चोरी): रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय से यह दुर्लभ प्रतिमा चोरी हो गई और अंतरराष्ट्रीय तस्करों के जरिए इसे देश से बाहर भेज दिया गया।
  2. 2014 (पहचान): दशकों तक गायब रहने के बाद वर्ष 2014 में न्यूयॉर्क के एक निजी संग्रह में इसकी पहली बार पहचान की गई।
  3. 2025 (जब्ती और भारत को सुपुर्दगी): लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, वर्ष 2025 में मैनहट्टन डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी की एंटीक्विटीज ट्रैफिकिंग यूनिट ने इसे जब्त किया। इसके बाद न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास में एक भव्य समारोह के दौरान भारतीय दूत राजलक्ष्मी कदम की उपस्थिति में इसे औपचारिक रूप से भारत को सौंप दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क का भंडाफोड़

इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच के दौरान भारत की प्राचीन कलाकृतियों को विदेशों में बेचने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। जांच एजेंसियों के मुताबिक, कलाकृतियों की अवैध तस्करी के कुख्यात सिंडिकेट चलाने वाले सुभाष कपूर और नैन्सी वीनर की भूमिका भी इस मामले में उजागर हुई है।


क्या है इस प्रतिमा की कलात्मक विशेषता?

कला विशेषज्ञों के अनुसार, अवलोकितेश्वर की यह कांस्य प्रतिमा अपनी सूक्ष्म और बारीक नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में अनूठी मानी जाती है। इसमें भगवान अवलोकितेश्वर को एक बेहद अलंकृत सिंहासन पर विराजमान दिखाया गया है। सिंहासन के ठीक ऊपर दोहरे कमल (Double Lotus) की कलात्मक कलाकृति इसकी सबसे बड़ी और विशेष पहचान है।

इस प्रतिमा का छत्तीसगढ़ लौटना न केवल पुरातत्व विभाग, बल्कि पूरे प्रदेश के नागरिकों के लिए गर्व का क्षण है, जो राज्य की प्राचीन बौद्ध संस्कृति को पुनः जीवंत करेगा।

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