रायपुर। देश भर में हिड़मा की मौत की खबर ने माओवाद के खिलाफ बड़ी जीत का जश्न मना लिया, पर जिस गाँव ने उसे जन्म दिया, उसी पूवर्ती गाँव में आज भी सन्नाटा पसरा है। खौफ इतना था कि पहले तो किसी ने भी यह मानने से इनकार कर दिया कि मारा गया हिड़मा हमारा वाला हिड़मा ही है।
प्रशासन ने गाँव में शिविर लगाया था। हिड़मा की बूढ़ी माँ माड़वी पूंजी भी भीड़ में मौजूद थीं। जब सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें मारे गए व्यक्ति की तस्वीर दिखाई, तो पहले तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया – ये हमारा नहीं है। लेकिन जब तस्वीर को करीब से देखा, तो ममता का बाँध टूट पड़ा। आँखें नम हो गईं। खुद को संभालते हुए माँ ने सिर्फ़ एक सवाल पूछा – शव कब आएगा… घर तो आएगा न?
हिड़मा का नाम सुनते ही गाँव में सन्नाटा छा जाता था। नौजवान भी फुसफुसाकर बात करते थे। उसकी मौजूदगी में कोई सरकारी योजना का लाभ नहीं लेता था। अब उसी गाँव में लोग खुलकर शिविर में आ रहे हैं, आधार कार्ड बनवा रहे हैं, बैंक खाते खुलवा रहे हैं। ग्रामीण फुसफुसाहट में कहते हैं – “समय रहते सरेंडर कर लेता तो अच्छा था… माँ की बात मान लेता।”
बता दें कि कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम विजय शर्मा पूवर्ती गाँव आए थे। माँ ने मंच से बेटे से घर लौटने की अपील की थी। माँ की आवाज़ हिड़मा तक पहुँची थी, पर उसने नहीं मानी। आज माँ के सामने सिर्फ़ शव आने की बात है।
17 नवंबर को आंध्र-ओडिशा बॉर्डर के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने हिड़मा सहित 6 खतरनाक माओवादियों को मार गिराया। यह वही हिड़मा था जो बस्तर से भागकर AOB में नया ठिकाना बना रहा था। 400 किमी के दुर्गम इलाके में माओवादी आंदोलन को फिर से खड़ा करने की उसकी सारी कोशिशें एक झटके में खत्म हो गईं। रामकृष्ण, उदय, अरुणा जैसे बड़े कमांडरों के मारे जाने के बाद हिड़मा ही आखिरी बड़ी उम्मीद था। उसकी मौत के साथ AOB में माओवाद के पुनर्जन्म की कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई।









