बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के हजारों बुजुर्ग पेंशनभोगियों (Pensioners) के पक्ष में बिलासपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने अत्यंत कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच वित्तीय देनदारियों को लेकर चल रहे किसी भी विवाद या सहमति का असर पेंशनर्स के वैध अधिकारों पर नहीं पड़ सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ (Division Bench) ने राज्य सरकार की उस रिट अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें सिंगल बेंच द्वारा एरियर भुगतान के दिए गए आदेश को चुनौती दी गई थी। इस फैसले के बाद अब पेंशनभोगियों को ५९ महीने (32+27 माह) का लंबित एरियर मिलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
क्या था पूरा विवाद और ‘कट-ऑफ’ का पेच?
यह पूरा मामला ‘छत्तीसगढ़ पेंशनर्स समाज’ द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में राज्य सरकार पर पेंशनर्स के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया गया था:
- छठवां वेतन आयोग: सरकार ने इसके लाभ के लिए १ सितंबर २००८ की कट-ऑफ तारीख तय की थी, जिससे पेंशनर्स ३२ महीने के एरियर से वंचित हो गए थे।
- सातवां वेतन आयोग: इसके लाभ के लिए १ अप्रैल २०१८ की कट-ऑफ तारीख तय की गई, जिसके कारण पेंशनर्स को २७ महीने का एरियर नहीं मिला।
- भेदभाव का आरोप: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करते समय पुराने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ जानबूझकर विसंगति पैदा की।
मध्य प्रदेश की सहमति का सरकारी तर्क खारिज
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, २००० की धारा ४९ का हवाला देते हुए दलील दी थी कि वित्तीय हिस्सेदारी तय होने और मध्य प्रदेश सरकार की सहमति के बिना यह भुगतान नहीं किया जा सकता।
इसके विपरीत, पेंशनर्स के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार पहले ही यह साफ कर चुकी है कि एरियर भुगतान के लिए पड़ोसी राज्य की सहमति की कोई वैधानिक अनिवार्यता नहीं है।
सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच ने रखा बरकरार
इससे पहले १ अप्रैल २०२६ को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सरकार के कट-ऑफ वाले आदेश को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया था और १२० दिनों के भीतर एरियर भुगतान का आदेश दिया था। सिंगल बेंच ने यह भी कहा था कि छत्तीसगढ़ सरकार पहले भुगतान करे, बाद में अपना हिस्सा मध्य प्रदेश सरकार से वसूलती रहे।
राज्य सरकार ने इसे नीतिगत मामला बताते हुए डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी, जिसे दो जजों की खंडपीठ ने सिरे से खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की तल्ख और मानवीय टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा कि दो राज्यों के बीच चल रहे प्रशासनिक या वित्तीय खींचतान का आर्थिक बोझ उन बुजुर्ग पेंशनभोगियों पर कतई नहीं डाला जा सकता, जिन्होंने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष शासकीय सेवा में दिए हैं। पेंशनर्स का हक रोकना न्यायसंगत नहीं है।
इस फैसले से छत्तीसगढ़ के हजारों बुजुर्गों और उनके परिवारों को उनका बकाया हक मिलने की उम्मीद अब पूरी तरह से हकीकत में बदलने जा रही है।








