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कनिष्ठ अधिकारी को डीईओ का प्रभार देने पर हाईकोर्ट सख्त: DEO नियुक्ति का आदेश निरस्त, वरिष्ठता की अनदेखी पर लिया एक्शन

बलौदा बाजार/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रशासनिक नियुक्तियों में वरिष्ठता की अनदेखी करने पर राज्य शासन को बड़ा झटका दिया है। न्यायालय ने बलौदा बाजार-भाटापारा जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) का प्रभार संदीप शर्मा को सौंपे जाने संबंधी राज्य सरकार के आदेश को पूरी तरह से निरस्त (क्वैश) कर दिया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि प्रभार सौंपते समय विभाग द्वारा वरिष्ठता के सिद्धांत (Principle of Seniority) का पालन नहीं किया गया, जो शासन के प्रचलित परिपत्रों, नियमों और प्रशासनिक पारदर्शिता के सर्वथा विपरीत है।

प्राचार्य हरिशंकर जोशी की याचिका पर आया फैसला

यह पूरा मामला लवन स्थित स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य हरिशंकर जोशी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद सामने आया है।

  • याचिकाकर्ता की दलील: हरिशंकर जोशी ने हाईकोर्ट में राज्य शासन के 10 जून 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारी संदीप शर्मा को जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार सौंप दिया गया था। याचिकाकर्ता ने सबूतों के साथ कोर्ट को बताया कि वे सेवा नियमों के तहत संदीप शर्मा से काफी वरिष्ठ हैं।

2016 के सीनियर को दरकिनार कर 2025 के जूनियर को मिला था प्रभार

मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ में हुई। कोर्ट ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि विभाग ने आदेश जारी करने में गंभीर लापरवाही बरती है:

  • सीनियरिटी का गणित: याचिकाकर्ता हरिशंकर जोशी वर्ष 2016 से स्कूल में प्राचार्य (Principal) के पद पर कार्यरत हैं। वहीं, दूसरी ओर प्रतिवादी संदीप शर्मा को बहुत बाद में, यानी वर्ष 2025 में प्राचार्य पद पर पदोन्नति (Promotion) मिली है।
  • नियमों का उल्लंघन: एकलपीठ ने कहा कि इतने वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी और उपेक्षा कर एक कनिष्ठ अधिकारी को डीईओ जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद का प्रभार देना छत्तीसगढ़ शासन के 4 अगस्त 2011 के परिपत्र सहित अन्य प्रचलित नियमों का सीधा उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने आदेश किया रद्द, सरकार को दी नए सिरे से आदेश की स्वतंत्रता

हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए 10 जून 2026 के विवादित सरकारी आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही न्यायालय ने राज्य शासन को यह स्वतंत्रता दी है कि वे नियमों के अनुरूप और वरिष्ठता का पूर्ण पालन करते हुए किसी उपयुक्त अधिकारी को जिला शिक्षा अधिकारी का प्रभार सौंपने के लिए नया आदेश जारी कर सकते हैं।

कानूनी और प्रशासनिक हलकों में हाईकोर्ट के इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में मर्जी के मुताबिक चहेते जूनियर अधिकारियों को उपकृत करने वाली प्रशासनिक नियुक्तियों पर लगाम लगेगी।

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