छत्तीसगढ़ पुलिस… नाम सुनते ही जेहन में आता है….मुस्तैदी, सुरक्षा और न्याय। लेकिन क्या आपको पता है कि आपकी सुरक्षा करने वाली ये पुलिस खुद उधार के भरोसे चल रही है? चौंक गए न? यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। यह छत्तीसगढ़ पुलिस का पिछले एक साल का वो खर्च है जो गाड़ियों, डीजल और मरम्मत के नाम पर हुआ है। और इसमें सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात ये है कि विभाग ने सिर्फ गाड़ियों के ‘किराये’ पर 130 करोड़ रुपये फूंक दिए! आज के इस स्पेशल पैकेज में हम खोलेंगे गृह विभाग की वो फाइल, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है। आखिर क्यों छत्तीसगढ़ पुलिस के पास अपनी गाड़ियाँ नहीं हैं? क्यों करोड़ों रुपये प्राइवेट टैक्सी मालिकों की जेब में जा रहे हैं? यह मामला तब सामने आया जब भाजपा विधायक राजेश मूणत ने विधानसभा में सवाल पूछा। गृहमंत्री विजय शर्मा ने जो लिखित जवाब दिया, उसने सबको सन्न कर दिया।
कुल खर्च: लगभग 350 करोड़
किराये की गाड़ियाँ: 130 करोड़
डीजल-पेट्रोल: 148 करोड़
मरम्मत: 41 करोड़
अन्य खर्च: 30 करोड़
अब सवाल ये है कि पुलिस के पास अपनी गाड़ियाँ कितनी हैं? विभाग के पास कहने को तो 2618 छोटी गाड़ियाँ, 720 मध्यम, 364 भारी वाहन और 6000 से ज्यादा बाइक हैं। लेकिन हकीकत ये है कि इनमें से आधे से ज्यादा ‘कंडम’ हो चुकी हैं। यानी वो गाड़ियाँ जो सिर्फ कागजों पर हैं या थाने के बाहर कबाड़ बन रही हैं। और इसी कबाड़ की वजह से प्राइवेट गाड़ियों का सहारा लेना पड़ता है। चलिए अब आपको उन जिलों के बारे में बताते हैं जहाँ गाड़ियों के किराये का खेल सबसे बड़ा है। सबसे पहले बात बीजापुर की।
बीजापुर: यहाँ करीब 7000 गाड़ियाँ किराये पर ली गईं और खर्च हुआ 26.30 करोड़ रुपये।
नारायणपुर: 6800 से ज्यादा गाड़ियाँ, खर्च 8.50 करोड़।
रायपुर (राजधानी): 6600 गाड़ियाँ, खर्च 15.51 करोड़।
यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि बीजापुर और नारायणपुर जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में निजी वाहनों पर डीजल का खर्च, सरकारी गाड़ियों से दो से तीन गुना ज्यादा है। नारायणपुर में सरकारी गाड़ियों का डीजल खर्च 2.50 करोड़ है, तो निजी गाड़ियों का 7.93 करोड़! क्या इन दुर्गम इलाकों में निजी गाड़ियाँ वाकई इतनी दौड़ रही हैं? या फिर किराये के नाम पर कोई बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है? अब कुछ कड़वे सवाल, जो जनता की ओर से हम पूछ रहे हैं…..अगर एक साल में 130 करोड़ रुपये सिर्फ किराये पर खर्च हो रहे हैं, तो इतने पैसों में पुलिस विभाग अपनी कितनी नई गाड़ियाँ खरीद सकता था? (एक बोलेरो की कीमत 10-12 लाख मान लें, तो 130 करोड़ में 1000 से ज्यादा नई गाड़ियाँ आ जातीं)। क्या सरकार को टैक्सी मालिकों को अमीर बनाने में ज्यादा दिलचस्पी है या पुलिस को आत्मनिर्भर बनाने में? मरम्मत के नाम पर 41 करोड़ रुपये खर्च हुए, फिर भी गाड़ियाँ कंडम क्यों हैं? क्या ये पैसा वाकई इंजन में डल रहा है या फाइलों में? वित्त विभाग के नियम कहते हैं कि ज़रूरत पड़ने पर गाड़ियाँ किराये पर ली जा सकती हैं। लेकिन जब ज़रूरत एक आदत बन जाए, तो समझिए दाल में कुछ काला है। छत्तीसगढ़ की जनता का टैक्स का पैसा पेट्रोल के धुएँ में उड़ रहा है और पुलिस आज भी पुरानी गाड़ियों को धक्का लगा रही है। अब देखना यह है कि गृहमंत्री विजय शर्मा के इस खुलासे के बाद क्या सरकार नई गाड़ियों की खरीदी करेगी, या अगले साल फिर ये आंकड़ा 400 करोड़ के पार जाएगा?










