छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को पदोन्नति (Promotion) प्राप्त करना मौलिक अधिकार नहीं है। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिविजन बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) पदोन्नति नियमों को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
क्या था मामला
मुख्य नगरपालिका अधिकारी पद पर पदोन्नत अधिकारियों, जिनमें पुष्पा खलखो सहित अन्य शामिल थे, ने कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। उनका कहना था कि सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारियों और राजस्व निरीक्षकों को एक समान मानकर प्रमोशन देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
साथ ही, 2 फरवरी 2018 के आदेश के तहत राजस्व निरीक्षकों को सेवा अनुभव में दी गई छूट को भी असंवैधानिक बताया गया था।
कोर्ट ने क्या कहा
हाई कोर्ट की डिविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि
- पदोन्नति के लिए फीडर कैडर तय करना सरकार का नीतिगत अधिकार है
- किसी कर्मचारी को प्रमोशन पाने का अधिकार नहीं, बल्कि केवल विचार किए जाने का अधिकार होता है
सुप्रीम कोर्ट से लौटा था मामला
इससे पहले हाई कोर्ट की एक बेंच ने इन नियमों को अवैध करार दिया था। जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को पुराने आदेश को रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए बिलासपुर हाई कोर्ट भेज दिया था।
राजस्व निरीक्षकों को राहत
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि राजस्व निरीक्षकों को CMO पद के लिए पात्र मानना पूरी तरह वैध है। इसके साथ ही अब RI से CMO पद पर प्रमोशन का रास्ता साफ हो गया है।
अनुभव में छूट भी सही
राज्य सरकार द्वारा अनुभव की अनिवार्यता 6 साल से घटाकर 5 साल करने के फैसले को भी कोर्ट ने सही ठहराया। कोर्ट ने माना कि अधिकारियों की कमी को देखते हुए यह निर्णय जनहित में लिया गया था।
सभी याचिकाएं खारिज
अंत में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। इसी आधार पर सभी याचिकाओं को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया गया।










