रायपुर। छत्तीसगढ़ को ‘धन का कटोरा’ कहा जाता है, लेकिन आज यही राज्य अपने पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार देने में हांफ रहा है। कॉलेज की डिग्रियां अलमारी में बंद हैं और छत्तीसगढ़ का युवा बेंगलुरु, पुणे और गुजरात के कारखानों में 12000 रूपए की नौकरी के लिए पलायन करने को मजबूर है। आखिर कब बदलेगी यह जमीनी हकीकत?
3 कड़वे सच
फाइलों में विकास, ज़मीन पर तलाश : कॉलेज से हर साल हजारों बीकॉम, इंजीनियरिंग और ग्रेजुएट्स निकल रहे हैं, लेकिन राज्य में बड़े उद्योगों की कमी के कारण लोकल स्तर पर 8-10 हजार से ऊपर की नौकरी नहीं है।
उम्र दराज, वैकेंसी का इंतज़ार : सरकारी भर्तियों (व्यापम, cgpsc) की तैयारी में युवाओं के 4-5 साल एक कमरे में गुज़र जाते हैं। कभी पेपर लीक, तो कभी कोर्ट-कचहरी के चक्कर में युवाओं की उम्र निकल रही है।
बेरोज़गारी से ख़तरनाक ‘मजबूरी’ : चपरासी या ग्रुप-डी की कुछ पोस्ट निकलती हैं, तो वहां पी.एचडी और पोस्ट ग्रेजुएट्स की लम्बी लाइनें लग जाती हैं।
सिस्टम से 3 सीधे सवाल
1 छत्तीसगढ़ के खनिज और संसाधनों का फायदा यहां के स्थानीय युवाओं को रोजगार के रूप में क्यों नहीं मिल पा रहा?
2 हर चुनाव में युवाओं को ‘वोट बैंक’ समझने वाले नेता चुनाव के बाद रोजगार के वादे क्यों भूल जाते हैं?
3 कौशल विकास के नाम पर करोड़ों खर्च होने के बाद भी युवा पलायन को मज़बूर क्यों हैं।
नेताओं के भाषणों में ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ की गूंज है, लेकिन जब तक यहां का पढ़ा-लिखा नौजवान अपना घर छोड़कर बाहर पसीना बहाने को मजबूर रहेगा, तब तक विकास का हर दावा अधूरा है। युवाओं को चुनावी रेवड़ियां नहीं, आत्मसम्मान का रोजगार चाहिए।










