बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार ने अश्लील वीडियो वायरल होने के मामले में बड़ा कदम उठाते हुए डीजीपी (सिविल राइट्स एनफोर्समेंट) के. रामचंद्र राव को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। सोशल मीडिया पर सामने आए कथित वीडियो में राव को कार्यालय परिसर में एक महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाए जाने का दावा किया जा रहा है, जिसके बाद राज्य की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया।
सोमवार को वायरल हुए कई वीडियो के बाद सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए निलंबन का आदेश जारी किया। सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया राव का आचरण ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स, 1968 का उल्लंघन प्रतीत होता है और इससे सरकारी सेवा की गरिमा को ठेस पहुंची है, साथ ही सरकार की छवि भी धूमिल हुई है। निलंबन अवधि के दौरान वे बिना लिखित अनुमति के मुख्यालय नहीं छोड़ सकेंगे।
हालांकि, डीजीपी रामचंद्र राव ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने वीडियो को पूरी तरह फर्जी और मनगढ़ंत बताया। गृह मंत्री जी. परमेश्वर से मुलाकात की कोशिश के दौरान मीडिया से बातचीत में राव ने कहा,
“मैं हैरान हूं। ये सभी वीडियो fabricated हैं। मुझे नहीं पता ये कहां से आए।”
उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन वीडियो को पुराना बताया जा रहा है, वे करीब आठ साल पुराने हो सकते हैं, जब वे बेलगावी में पदस्थ थे। राव ने कहा कि वे अपने वकीलों से सलाह लेकर कानूनी कार्रवाई करेंगे।
सरकारी आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वीडियो के सार्वजनिक होने से न केवल विभागीय अनुशासन पर सवाल खड़े हुए हैं, बल्कि यह एक वरिष्ठ अधिकारी के आचरण को लेकर गंभीर चिंता का विषय है। इसी आधार पर उन्हें निलंबित किया गया है और मामले की विस्तृत जांच की जाएगी।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का बयान
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा,
“यदि जांच में दोष सिद्ध होता है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। कानून सबके लिए समान है, चाहे अधिकारी कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो।”
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब आईपीएस रामचंद्र राव विवादों में आए हैं। इससे पहले उनकी बेटी रान्या राव का नाम सोना तस्करी से जुड़े एक मामले में सामने आ चुका है, जिसमें उन्हें आरोपी भी बनाया गया था।
फिलहाल, राज्य सरकार ने पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। यह मामला कर्नाटक प्रशासन में अनुशासन और जवाबदेही को लेकर एक अहम परीक्षा माना जा रहा है।









