रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा में गुरुवार को धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 पेश होते ही सियासी माहौल गरमा गया। सरकार इसे आवश्यक कानून बता रही है, जबकि विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों का हवाला देते हुए कड़ा विरोध जताया।
सदन में विधेयक पेश
विधेयक को विधानसभा में पेश करते हुए डिप्टी सीएम और गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि यह कानून प्रदेश में धर्मांतरण से जुड़े मामलों को नियंत्रित करने और कानूनी स्पष्टता लाने के उद्देश्य से लाया गया है।
विपक्ष ने जताई कड़ी आपत्ति
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने कहा कि मध्यप्रदेश समेत 11 राज्यों के ऐसे ही कानून सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने सरकार पर जल्दबाजी का आरोप लगाया और कहा कि जब तक शीर्ष अदालत का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक इस विषय पर चर्चा करना उचित नहीं है।
सरकार का पलटवार
डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर कोई स्टे नहीं दिया है और नए कानून बनाने पर कोई रोक नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सदन में चर्चा के दौरान सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा। भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने भी कहा कि विधेयक पूरी तरह से कानूनी प्रक्रिया के तहत लाया गया है।
आसंदी ने खारिज की विपक्ष की आपत्तियां
विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बहस के बाद आसंदी ने विपक्ष की आपत्तियां खारिज कर दीं। इसके बाद विजय शर्मा ने विधेयक का पुनःस्थापन किया और सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाई।
विपक्ष का वॉकआउट
आसंदी के फैसले से नाराज विपक्ष ने सदन की कार्यवाही से वॉकआउट कर दिया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताते हुए पूरे दिन की कार्यवाही का बहिष्कार किया। इस कारण विधानसभा का माहौल पूरी तरह सियासी टकराव में बदल गया।
धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026: क्या है उद्देश्य?
- जबरन धर्म परिवर्तन पर रोक: किसी भी व्यक्ति को लालच, दबाव या धोखे से धर्म बदलवाना अपराध होगा।
- आदिवासी और कमजोर वर्गों की सुरक्षा: समाज के कमजोर वर्गों को धार्मिक दबाव से बचाने के प्रावधान।
- कानूनी स्पष्टता: राज्य में धर्मांतरण से जुड़े मामलों को विनियमित करना।
ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे कई राज्यों में पहले से ऐसे “धर्म स्वतंत्रता” या “एंटी-कन्वर्जन” कानून लागू हैं और सुप्रीम कोर्ट में इन पर कानूनी बहस जारी है।








