India's national anthem
रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने रायपुर में वन्दे मातरम् की 150 वीं वर्षगांठ में इंडोर स्टेडियम और मंत्रालय महानदी भवन में कार्यक्रम आयोजित किये। सीएम विष्णुदेव साय ने मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम्’ का गायन किया। इस अवसर पर सभी ने “वंदे मातरम्” के उद्घोष के साथ आज़ादी की राष्ट्रीय चेतना का पुण्य स्मरण किया और अमर बलिदानियों को नमन किया।
इस मौके पर सीएम साय ने कहा- यह गीत सबके मन में राष्ट्रभक्ति की भावना जगाती थी, और वन्दे मातरम् का नारा बुलंद कर के अनेक महापुरुषों ने देश के लिए फांसी के फंदे को चुन लिया। ऐसी ताकत इस वन्दे मातरम् गीत में है, पीएम ने आवाहन किया और छत्तीसगढ़ में 5 जगहों में इसका आयोजन हुआ। यह साल भर चलने वाला है,
वही छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने इस कार्यक्रम को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। बैज ने कहा, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर वन्दे मातरम की वर्षगांठ मना रही है, लेकिन इस कार्यक्रम के साथ ही आजादी का विरोध करने वाली पार्टी को देश की जनता से माफी भी मांगनी चाहिए। वंदे भारत की गीत ने आजादी के लड़ाई के लिए उत्साह बढ़ाया था, देश के क्रांतिकारियों ने इस गीत को गाकर देश के आजादी की लड़ाई लड़ी।
लेकिन उस दौर में आरएसएस और बीजेपी के नेता अंग्रेजों की चापलूसी करते थे और आजादी की लड़ाई का विरोध करते थे, इन्हे उसके लिए देश की जनता से माफ़ी मांगनी चाहिए। आरएसएस साल 1925 में बना था, ये बताए की इनका देश की आजादी में क्या योगदान दिया। ये मुस्लिम लीग के साथ सरकार चलाने वाले लोग है। इन्होने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजो का साथ दिया, आज ये किस नैतिकता के साथ वन्दे मातरम् की वर्षगांठ मना रहे है।
वन्दे मातरम् गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर आम-जनमानस में काफी उत्साह दिखा, जब हमने उनसे बात की तो उन्होंने बताया – वन्दे मातरम् गीत से सेनानी काफी प्रभावित हुए, 150 साल पूरे होने पर हमें ख़ुशी हो रही है, देश ऐसी ही आगे बढ़ते रहे, इस गीत से बहुत लोगों को प्रेरणा मिली है, आजादी के पूर्व इस गीत को सुनकर सब उत्साहित हुए, इस गीत में मंत्र है, शक्ति है… साधना है, इस गीत ने सम्पूर्ण भारत को एकता के सूत्र में पिरोया है।
लेकिन क्या आपको पता है, राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् की शुरुआत कैसे हुई और बंकिम चंद्र चटर्जी के मन में इसका ख्याल कैसे आया। आज इस रिपोर्ट में हम आपको देश की एकता, और बलिदानियों के दिलों की धड़कन वन्दे मातरम् के उन अनछुए पहलुओं को बतायेगे, शायद जिससे आप अनजान होंगे।
ये बात है उस समय की जब हमारा प्यारा देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ अंग्रेजों का गुलाम था। बात है साल 1870 के दशक की, जब अंग्रेजों ने तुगलकी फरमान जारी कर देश के प्रमुख संस्थानों में गॉड! सेव द क्वीन को गाए जाने को अनिवार्य कर दिया। उस वक्त ब्रिटिश प्रशासनिक सेवा में कई भारतीय अधिकारी भी थे। फरमान बंगाल की जमीन से ही आया था, इसलिए वहां इसे लेकर काफी सख्ती थी, लेकिन यह बात सबसे अधिक नागवार गुजरी, एक डिप्टी कलक्टर को, जो भारतीय था।
अंग्रेजों के इस फरमान से छुब्ध वह भारतीय अपने दफ्तर से निकालता है, और सियालदह से नैहाटी के लिए ट्रेन में बैठ गया, उसके मन में उठी उठा-पटक में तमाम विचार शब्द बन गए और कागज-कलम का साथ पाते ही गीत के रूप में उभर आए, इस यात्रा में जो लिखा गया, वह सिर्फ एक गीत नहीं था, वह स्तुति थी, आरती थी, वंदना थी और राष्ट्र का संगठित भावना का मंत्र था, वह था गीत वंदे मातरम्, जो जन्मभूमि को प्रणाम करने और उसके प्रति आभार जताने का जरिया बना और आगे चलकर क्रांति की मशाल बन गया।
वह डिप्टी कलक्टर कोई और नहीं, वह थे महान लेखक, विचारक और पत्रकार बंकिम चंद्र चटर्जी। जिनका लिखा वंदे मातरम् गीत ब्रिटिशर्स के ‘गॉड सेव द क्वीन का सुरमयी विरोध बना। जिसे अंग्रेजों ने डर के मारे बैन किया और आजाद भारत ने राष्ट्रगीत के तौर पर अपनाया,
लेकिन.. विडंबना देखिए विवादों और आपत्तियों से यह गीत भी बच नहीं पाया. समय के साथ इसके दो भाग हो गए, एक जिसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला और दूसरा जो समय की परत के नीचे गुम होता गया और भारत की अधिकांश बड़ी जनसंख्या के स्मृति पटल से भुला दिया गया।
आज आजाद भारत के तमाम नागरिक यह नहीं जानते कि राष्ट्रगीत वंदे मातरम् सिर्फ दो पैराग्राफ तक सीमित नहीं है. इसमें चार अन्य पैराग्राफ भी हैं, जिन्हें राष्ट्रीय समारोहों में नहीं गाया जाता. आखिर इस गीत के बनने के बाद इसके राष्ट्रगीत के तौर पर शामिल होने और फिर इसके कुछ हिस्सों को लेकर क्या और कब से विवाद रहा, इस पर एक नजर डालते हैं।
बंकिम चंद्र चटर्जी ने यह गीत कब और किस प्रेरणा से लिखा इसका जिक्र उन्होंने आनंद मठ उपन्यास के तीसरे संस्करण में किया था , की कैसे अंग्रेजों के फरमान से दुखी होकर गॉड सेव द क्वीन के जवाब में संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया – वन्दे मातरम्।
शुरुआत में इसके केवल दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे। इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी, इसे सबसे पहले उन्होंने अपने ही द्वारा निकाली जाने वाली पत्रिका बंग दर्शन में प्रकाशित किया था, बाद में जब 1882 में आनंद मठ उपन्यास की रचना उन्होंने की थी, तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को भी उसमें शामिल किया था।
यानी यह गीत दो बार और दो बार में लिखा गया। उपन्यास में गीत को जब शामिल किया गया तब पहले दो पैराग्राफ के बाद के पैरे उपन्यास की मूल भाषा बांग्ला में ही थे, बाद वाले इन सभी पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है। यह गीत रविवार, 7 नवम्बर 1875 को लिखा गया था।
वंदे मातरम् गीत ने आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, कोई क्रांतिकारी देश के किसी कोने में वंदे मातरम बोलता था तो कलकत्ता से दिल्ली तक अंग्रेजी हुकूमत की नीव हिल जाती थीं। बंगाल की क्रांतिकारी मातंगिनी हाजरा, गरम दल के सभी क्रांतिकारी और यहां तक कि नरम दल के नेता भी वंदे मातरम् का उद्घोष सार्वजनिक तौर पर करते थे, अंग्रेज इससे घबराते थे, इसलिए उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
पीआईबी के एक नोट से इसकी पुष्टि होती है कि अंग्रेजों ने साल 1906 के अप्रैल में नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत के बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान, वंदे मातरम के सार्वजनिक नारे लगाने पर रोक लगा दी थी, वह वंदे मातरम् से इतना घबराए कि उन्होंने सम्मेलन पर ही रोक लगा दी, आदेश की अवहेलना करते हुए, प्रतिनिधियों ने नारा लगाना जारी रखा और उन्हें पुलिस के भारी दमन का सामना मकरना पड़ा। इस तरह सार्वजनिक तौर पर वंदे मातरम् पर बैन की बात पहली बार सामने आती है।
लेकिन वन्दे मातरम् से घबराहट और इसका विरोध आजादी के बाद भी जारी है, आज भी देश के कई मजहब और समुदाय इसे गाने या स्वीकार करने में घबराते है। उनका कहना है की, इसे गाने की इजाजत नहीं देता, ये सोचने वाली बात है कि ये कैसा मजहब है, जो इस देश में रहने, माँ भारती की गोद से खेलने और जीने की अनुमति देता है, वही मजहब उस माँ की स्तुति करने से रोकता है।









