रायपुर। “19 जनवरी 2025… यह वह तारीख है जिसने मेरी हंसती-खेलती दुनिया को उम्र भर का मातम दे दिया। मैं अपने 7 साल के बेटे पुष्कर को उसकी जिद पर पार्क घुमाने ले गया था, क्या पता था कि वह सैर उसकी आखिरी यात्रा बन जाएगी।” यह दर्द उन आंसुओं से छलक रहा है जो पिछले एक साल से थमे नहीं हैं।
रायपुर में प्रतिबंधित चाइनीज मांझे ने न केवल एक मासूम की जान ली, बल्कि एक हंसते-खेलते परिवार को जीते-जी मार दिया। पुष्कर के पिता की आपबीती आज शहर के हर उस शख्स के लिए चेतावनी है जो शौक के लिए मौत का धागा (चाइनीज मांझा) इस्तेमाल करता है।
वह खौफनाक मंजर: जब गले में फंसा मौत का फंदा
संतोषी नगर के रहने वाले पुष्कर के पिता अपने बेटे को कटोरा तालाब उद्यान ले जा रहे थे। पचपेड़ी नाके के पास अचानक हवा में तैरता एक अदृश्य कातिल यानी ‘चाइनीज मांझा’ पुष्कर के गले में लिपट गया। पिता बताते हैं, “बच्चा तड़पने लगा, जब मैंने गाड़ी रोकी तो देखा कि उसका गला कट चुका था और खून का फव्वारा फूट पड़ा था।”
सिस्टम की विफलता: अस्पताल दर अस्पताल भटकते रहे, पर नहीं मिला इलाज
पिता की दास्तां हमारे शहर की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोलती है:
- पहला अस्पताल (गुडविल्स): हाथ खड़े कर दिए, कहा- इलाज संभव नहीं।
- दूसरा अस्पताल (बाल गोपाल): रविवार का हवाला देकर ऑपरेशन से मना कर दिया गया।
- तीसरा अस्पताल (मेकाहारा/आंबेडकर): जब तक यहाँ पहुँचे, पुष्कर की सांसें टूट चुकी थीं।
पिता का सवाल आज भी हवा में गूँज रहा है- “अगर रविवार को डॉक्टर होते या पहले अस्पताल में इलाज मिल जाता, तो क्या मेरा पुष्कर आज मेरे साथ नहीं होता?”
हादसे के बाद प्रशासन ने मुआवजे के तौर पर ढाई लाख रुपये थमा दिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक मासूम की जिंदगी का मोल इतना ही है?सरकार ने चाइनीज मांझे को बैन तो किया है, लेकिन आज भी दुकानों पर यह छिपकर बिक रहा है। हर साल मकर संक्रांति के आसपास दिखावे की छापेमारी होती है, पर कातिल मांझा सड़कों पर लोगों के गले काट रहा है।
“मेरा बच्चा चला गया, अब त्योहारों पर घर में सिर्फ सन्नाटा और पत्नी की सिसकियां होती हैं। पुष्कर हमारे घर की आस था।” पिता ने नम आंखों से अपील की है कि लोग इस खतरनाक मांझे का उपयोग न करें। आपकी थोड़ी सी लापरवाही किसी की पूरी दुनिया उजाड़ सकती है।









