आज बाजार खुलते ही जहां एक तरफ शेयरों में बिकवाली का दबाव देखा गया, वहीं दूसरी तरफ भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के सामने बुरी तरह पस्त हो गया है. नए कारोबारी सप्ताह के पहले ही दिन रुपए ने इतिहास का सबसे निचला स्तर छू लिया है. सोमवार को भारतीय मुद्रा 44 पैसे यानी करीब 0.60% के भारी नुकसान के साथ 92.333 प्रति डॉलर के भाव पर खुली. यह गिरावट यहीं नहीं थमी, बल्कि कुछ ही देर में रुपया टूटकर 92.52 के सर्वकालिक निचले स्तर (All-time low) पर जा पहुंची. हालांकि बाद में थोड़ी रिकवरी आई.
डॉलर के आगे क्यों घुटने टेक रहा है रुपया?
इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आया भयानक उछाल है. मध्य पूर्व में लगातार गहराते संघर्ष और आपूर्ति की बाधाओं ने वैश्विक बाजार को हिलाकर रख दिया है. इन विपरीत परिस्थितियों के कारण तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के बेहद करीब पहुंच गई हैं. यह भारत जैसे उन देशों के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं.
अर्थशास्त्र के सामान्य नियम के अनुसार, भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस तेल की खरीददारी के लिए भुगतान डॉलर में करना पड़ता है. ऐसे में जब वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है, तो भारत को इस आयात के लिए अपनी तिजोरी से कहीं ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. डॉलर की यह अप्रत्याशित मांग हमारे रुपए की ताकत को कम कर देती है और मुद्रा औंधे मुंह नीचे आ गिरती है. ईरान संकट बढ़ने से इस बात की आशंका और प्रबल हो गई है कि तेल की आपूर्ति में और भी बाधाएं आ सकती हैं.
बढ़ गया व्यापार घाटे का डर
महंगे तेल का यह दुष्चक्र सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक ही सीमित नहीं रहता. आर्थिक जानकारों के अनुसार, तेल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों ने पूरे वैश्विक परिदृश्य में एक बड़ी आर्थिक अनिश्चितता को जन्म दिया है. जब भारत को आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा चुकानी पड़ती है, तो देश का व्यापार घाटा तेजी से चौड़ा होने लगता है. व्यापार घाटा बढ़ने का सीधा अर्थ है विदेशी मुद्रा की बढ़ती जरूरत, जो रुपए पर और अधिक दबाव डालती है.
इस पूरी वैश्विक उथल-पुथल का सबसे ज्यादा असर आम आदमी पर पड़ने वाला है. कच्चे तेल के महंगे होने और रुपए के कमजोर होने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि की आशंका बन गई है. जब ईंधन के दाम बढ़ते हैं, तो परिवहन महंगा हो जाता है. इसका सीधा असर रोजमर्रा के जरूरी उत्पादों पर पड़ता है और आम जनता को चौतरफा महंगाई का सामना करना पड़ता है.
रिज़र्व बैंक कैसे रोकेगा यह गिरावट
इस मुश्किल वक्त में घरेलू मुद्रा को संभालने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) लगातार जरूरी कदम उठाता रहा है. लेकिन, मौजूदा हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हैं. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इतनी तेजी से भाग रही हों, तो केंद्रीय बैंक के लिए भी रुपए को पूरी तरह स्थिर रख पाना बहुत कठिन हो जाता है. बाजार विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अगर कच्चे तेल में यह तेजी आगे भी बरकरार रहती है, तो आने वाले दिनों में रुपए पर दबाव और भी गहरा सकता है.









