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मुंह से जलाभिषेक,आखें की अर्पित… जानिए शिव भक्त कन्नप्पा की कहानी

Kannappa Nayanar ki Kahani: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए खास माना जाता है. इस महीने देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है. कोई भोलेनाथ को बेलपत्र चढ़ाता है तो कोई दूध और गंगाजल से अभिषेक करता है. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे शिव भक्त के बारे में सुना है, जिसने पूजा की पारंपरिक विधि न जानते हुए भी अपने अनोखे तरीके से भगवान शिव को अपना सब कुछ समर्पित कर दिया? यह कहानी है भगवान शिव के महान भक्त कन्नप्पा नयनार की. कहा जाता है कि कन्नप्पा को पूजा-पाठ के नियम और विधि नहीं मालूम थी, लेकिन उनके मन में भगवान शिव के लिए इतना गहरा प्रेम था कि उन्होंने अपनी आंख तक भोलेनाथ को अर्पित करने का संकल्प ले लिया. कन्नप्पा की ये कहानी मुख्य रूप से तमिल ग्रंथ पेरिया पुराणम और तेलुगु ग्रंथ बसव पुराणम में मिलती है. सावन के इस पवित्र महीने में आइए जानते हैं शिव भक्त कन्नप्पा की कहानी और आखिर क्यों उनकी भक्ति को इतना अनोखा माना जाता है.

कौन थे शिव भक्त कन्नप्पा?
तमिल ग्रंथ पेरिया पुराण के अनुसार, कन्नप्पा शिकारी समुदाय से जुड़े हुए थे और जंगल में शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे. उनका जीवन जंगल और प्रकृति के बीच ही बीतता था. उन्हें पूजा-पाठ की पारंपरिक विधियों का ज्ञान नहीं था और न ही वह किसी विशेष धार्मिक नियम के अनुसार पूजा करते थे. कहा जाता है कि एक दिन शिकार करते हुए कन्नप्पा एक ऐसे स्थान पर पहुंचे, जहां उन्हें भगवान शिव का शिवलिंग दिखाई दिया. यह स्थान आज आंध्र प्रदेश के श्रीकालहस्ती से जोड़ा जाता है. शिवलिंग को देखते ही उनके मन में एक अलग तरह की भावना पैदा हुई. वह शिवलिंग की ओर आकर्षित हो गए और उनके मन में भगवान शिव के प्रति भक्ति जागने लगी.

कन्नप्पा अपने तरीके से करते थे भगवान शिव की पूजा
कन्नप्पा को यह नहीं पता था कि भगवान शिव की पूजा किस तरह की जाती है. उन्हें न तो मंत्र मालूम थे और न ही पूजा की कोई विधि. लेकिन उनके मन में भोलेनाथ के लिए सच्चा प्रेम था. वह जंगल में शिकार करने के बाद शिवलिंग के पास पहुंचते और अपने साथ लाया हुआ भोजन भगवान शिव को अर्पित करते. धार्मिक कथा के अनुसार, वह शिकार से मिले मांस को भी शिवलिंग पर चढ़ाते थे. इसके अलावा शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए वह अपने मुंह में पानी भरकर लाते और भगवान शिव पर अर्पित कर देते थे. कन्नप्पा जंगल से फूल और पत्तियां भी लेकर आते और उन्हें बिना किसी विशेष विधि के शिवलिंग पर चढ़ा देते थे.

पुजारी कन्नप्पा की पूजा देखकर हो जाते थे परेशान
कहा जाता है कि उस शिवलिंग की नियमित पूजा एक पुजारी किया करते थे. जब वह पूजा करने के लिए मंदिर पहुंचते तो शिवलिंग की स्थिति देखकर उन्हें बहुत दुख होता .उन्हें लगता था कि कोई शिवलिंग को अपवित्र कर रहा है. शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद कोई जंगली जानवर ऐसा कर रहा है. लेकिन जब यह रोज होने लगा तो उन्हें समझ आया कि इसके पीछे किसी इंसान का हाथ है. पुजारी ने पूजा के इन तरीकों से दुखी रहने लगे. कथा के अनुसार, एक दिन भगवान शिव ने उन्हें सपने में संकेत दिया कि यह सब उनका ही एक भक्त कर रहा है. वह पूजा की विधि नहीं जानता, लेकिन उसके मन में भगवान के लिए सच्चा प्रेम है. भगवान शिव ने पुजारी को कन्नप्पा की भक्ति देखने के लिए छिपकर वहां रहने का संकेत दिया. इसके बाद जो हुआ, वह कन्नप्पा की भक्ति को अमर करने वाली घटना बन गई.

शिवलिंग से बहने लगा खून
एक दिन कन्नप्पा हमेशा की तरह शिवलिंग की पूजा करने पहुंचे. उन्होंने अपने तरीके से भगवान शिव को भोजन अर्पित किया और जल चढ़ाया. तभी उन्होंने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से खून बह रहा है.यह देखकर कन्नप्पा घबरा गए. उन्होंने अपनी समझ के अनुसार खून रोकने की कोशिश की. उन्होंने जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया, लेकिन खून नहीं रुका. कन्नप्पा के लिए भगवान शिव कोई पत्थर का शिवलिंग नहीं, बल्कि उनके अपने भगवान थे. वह उन्हें दर्द में नहीं देख सकते थे. जब उन्हें लगा कि कोई दूसरा उपाय नहीं है तो उन्होंने अपनी एक आंख भगवान शिव को अर्पित करने का फैसला किया.

अपनी आंख भगवान शिव को कर दी अर्पित
कथा के अनुसार, कन्नप्पा ने अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग पर रख दी. इसके बाद शिवलिंग की आंख से बह रहा खून रुक गया. लेकिन तभी शिवलिंग की दूसरी आंख से भी खून बहने लगा. कन्नप्पा ने बिना किसी डर के अपनी दूसरी आंख भी भगवान शिव को देने का निर्णय कर लिया. लेकिन इस बार उनके सामने एक मुश्किल थी. उनकी एक आंख पहले ही जा चुकी थी. ऐसे में वह दूसरी आंख निकालने के बाद शिवलिंग की जगह को देख नहीं पाते. इसलिए कन्नप्पा ने अपने पैर के अंगूठे से उस स्थान को चिन्हित किया, जहां उन्हें अपनी दूसरी आंख अर्पित करनी थी. वह अपनी दूसरी आंख निकालने ही वाले थे कि तभी भगवान शिव खुद प्रकट हो गए.

भगवान शिव ने कन्नप्पा को दिया आशीर्वाद
भगवान शिव कन्नप्पा की भक्ति से बेहद प्रसन्न हुए. उन्होंने उन्हें दूसरी आंख अर्पित करने से रोक दिया. इसके बाद भगवान शिव ने कन्नप्पा को उनकी आंखे वापस दी और उन्हें अपने चरणों में स्थान दिया. मान्यता है कि भगवान शिव ने ही थिन्नन को कन्नप्पा नाम दिया. इसके बाद वह भगवान शिव के महान भक्तों में शामिल हो गए.उनकी कहानी इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि भगवान के लिए पूजा की बाहरी विधि से ज्यादा महत्वपूर्ण भक्त के मन की भावना होती है.

श्रीकालहस्ती से जुड़ी है कन्नप्पा की कहानी
कन्नप्पा की कथा आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध श्रीकालहस्ती मंदिर से गहराई से जुड़ी हुई है. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित प्रमुख मंदिरों में से एक है और इसे पंचभूत स्थलों में वायु तत्व से जुड़ा माना जाता है. श्रीकालहस्ती में कन्नप्पा स्वामी से जुड़ी परंपरा भी देखने को मिलती है. यहां आज भी भक्त कन्नप्पा की भक्ति को श्रद्धा के साथ याद करते हैं.

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