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Jaitusav Math Property Case: हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका, कहा- पुजारी भगवान की संपत्ति का स्वतंत्र मालिक नहीं बन सकता

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर के श्री ठाकुर रामचंद्र जी स्वामी जैतूसाव मठ पब्लिक ट्रस्ट की संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम मैनेजर/सर्वराकार के रूप में दर्ज किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी नाम की प्रविष्टि से सर्वराकार पद या ट्रस्ट की संपत्ति पर वास्तविक अधिकार का अंतिम फैसला नहीं होता।

महंत राम आशीष दास ने दायर की थी याचिका

यह याचिका महंत राम आशीष दास, निवासी जैतूसाव मठ, पुरानी बस्ती रायपुर ने दायर की थी। उन्होंने खुद को दिवंगत महंत राम भूषण दास का शिष्य बताते हुए वसीयत, गोद लेने के दस्तावेज और सर्वराकार के रूप में नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट की संपत्तियों पर अपना अधिकार बताया था।

महंत राम भूषण दास की मृत्यु 16 नवंबर 2007 को हुई थी। वे उस समय ट्रस्ट के सर्वराकार थे।

मामले में महेंद्र कुमार अग्रवाल ने ट्रस्ट की भरेंगा और भटगांव स्थित कृषि भूमि समेत अन्य संपत्तियों के राजस्व रिकॉर्ड से दिवंगत महंत का नाम हटाकर कलेक्टर का नाम दर्ज करने की मांग की थी।

तहसीलदार से लेकर राजस्व मंडल तक पहुंचा मामला

इस मामले की प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरी। 13 अक्टूबर 2010 को तहसीलदार ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामला पहले से न्यायालय और रजिस्ट्रार के समक्ष लंबित है।

इसके बाद 21 मार्च 2012 को एसडीओ ने याचिकाकर्ता को नोटिस दिए बिना कलेक्टर का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया।

इसके खिलाफ हुई कार्रवाई में कलेक्टर ने अपील खारिज कर दी, जबकि संभागायुक्त ने 5 दिसंबर 2014 को संबंधित आदेश को निरस्त कर दिया।

बाद में राजस्व मंडल ने 28 अप्रैल 2016 को संभागायुक्त के आदेश को पलटते हुए एसडीओ और कलेक्टर के आदेश बहाल कर दिए।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति मामले में निर्धारित सिद्धांत का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि किसी मंदिर या धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार रखने वाला पुजारी या सर्वराकार उस संपत्ति का स्वतंत्र मालिक नहीं बन जाता।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर का नाम दर्ज होना ट्रस्ट की संपत्ति के प्रबंधन या सर्वराकार पद पर किसी व्यक्ति के वास्तविक अधिकार का अंतिम निर्धारण नहीं है।

यदि याचिकाकर्ता सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी के सामने अपना अधिकार साबित करता है, तो राजस्व रिकॉर्ड में की गई प्रविष्टियां उस अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।

पांच साल से ज्यादा की देरी भी बनी वजह

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए देरी के पहलू को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के अनुसार, 28 अप्रैल 2016 के राजस्व मंडल के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका 28 अगस्त 2021 को दाखिल की गई थी।

यानी आदेश के खिलाफ याचिका दाखिल करने में पांच साल से अधिक की देरी हुई। अदालत ने कहा कि इस देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी।

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