जबलपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के जबलपुर से एक चौंकाने वाला भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में कैंसर और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए ‘पंचगव्य’ (गोबर, गौमूत्र, दूध, दही और घी) पर शोध करने के नाम पर शासन से मिले 3.50 करोड़ रुपये का दुरुपयोग करने का आरोप लगा है। जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि रिसर्च के बजाय यह पैसा अधिकारियों के निजी ऐशो-आराम पर खर्च किया गया।
रिसर्च के नाम पर ‘अय्याशी’: कहाँ खर्च हुए पैसे?
कलेक्टर के निर्देश पर अपर कलेक्टर आर.एस. मरावी और जिला कोषालय अधिकारी विनायकी लकरा की जांच में भ्रष्टाचार की लंबी फेहरिस्त सामने आई है. ₹1.92 करोड़ गोबर, गौमूत्र और मशीनों की खरीदी में दिखाए गए, जबकि उन मशीनों की वास्तविक कीमत मात्र 15-20 लाख रुपये है। रिसर्च के बहाने गोवा और बेंगलुरु जैसे शहरों की 24 हवाई यात्राएं की गईं। फंड से ₹7.5 लाख की कार खरीदी गई और करीब ₹7.5 लाख पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस पर फूंके गए। ₹15 लाख के टेबल और इलेक्ट्रॉनिक आइटम खरीदे गए और ₹3.50 लाख लेबर पेमेंट दिखाया गया।
जांच में सहयोग नहीं और गायब दस्तावेज
रिपोर्ट के मुताबिक, यह घोटाला 2011 से 2018 के बीच हुआ। जांच टीम ने पाया कि कई अहम दस्तावेज या तो नष्ट कर दिए गए या जानबूझकर उपलब्ध नहीं कराए गए। इस मामले में यशपाल साहनी, सचिन कुमार जैन और गिरिराज सिंह सहित विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है।
विश्वविद्यालय की सफाई: “सब कुछ ऑडिटेड है”
विश्वविद्यालय के कुलगुरु मनदीप शर्मा ने आरोपों को पुराना बताते हुए कहा कि यह योजना 2017-18 में ही समाप्त हो गई थी। उनकी दलील है कि सभी तकनीकी और वित्तीय रिपोर्ट फंडिंग एजेंसी को दी जा चुकी हैं और वे ऑडिटेड थीं। फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है।
सियासी घमासान: “गाय के नाम पर भी भ्रष्टाचार”
“बीजेपी जिस गाय को पूजने का दावा करती है, उसके नाम पर भी घोटाला कर दिया गया। दोषियों पर तुरंत FIR होनी चाहिए।” मोहन सरकार भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर है। जांच जारी है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।”
अगला कदम: FIR की तैयारी
जांच रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपी जा चुकी है। सूत्रों के अनुसार, इस मामले में जल्द ही FIR दर्ज हो सकती है और पुलिस जांच शुरू की जाएगी। यह मामला न केवल वित्तीय भ्रष्टाचार का है, बल्कि वैज्ञानिक भरोसे के साथ खिलवाड़ का भी है।










