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बिल पास करने को लेकर SC का फैसला; सुप्रीम कोर्ट ने कहा – राज्यपाल पर समय-सीमा नहीं लगा सकते

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों पर मंजूरी की समयसीमा तय करने पर अपना फैसला सुनाया. सीजेआई के नेतृत्व वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपाल पर कोई समय-सीमा नहीं लगा सकता. सिवाय इसके कि वह उन्हें एक उचित अवधि में निर्णय लेने के लिए कहे. सीजेआई ने कहा कि समय-सीमा लागू करना संविधान द्वारा इतनी सावधानी से संरक्षित इस लचीलेपन के बिल्कुल विपरीत होगा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना ​कि राज्यपाल राज्य विधेयकों पर अनिश्चित काल तक रोक नहीं लगा सकते, लेकिन उसने राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसा करना शक्तियों के पृथक्करण के विरुद्ध होगा.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा, केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से राष्ट्रपति संदर्भ के पक्ष में दी गई दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज किया गया है. उन्होंने कहा कि पहला मुद्दा यह है कि हम राज्यपाल के साथ विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. दलील यह है कि विषय स्पष्ट है प्रस्तुत होने पर राज्यपाल विधेयक को स्वीकृति दे सकते हैं या उसे रोक सकते हैं या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकते हैं.

इस दलील के अनुसार पहला लेकिन एक अतिरिक्त विकल्प है, जिससे उनके पास कुल 4 विकल्प उपलब्ध हो जाते हैं. इसके खिलाफ, दूसरे पक्ष ने कहा कि उनके पास केवल तीन विकल्प हैं, रोकना, स्वीकृति देना या विधानसभा को भेजना और यदि सदन पारित करता है, तो राज्यपाल स्वीकृति देने के लिए बाध्य हैं.

दूसरी व्याख्या पहले को बाध्य करने की है, जिसमें राज्यपाल के पास 3 विकल्प होते हैं. राज्यपाल उसे स्वीकृति दे सकते हैं, आरक्षित कर सकते हैं या रोक सकते हैं और विधानसभा को वापस कर सकते हैं और पारित होने पर होता है. ऐसा कहा गया कि चार विकल्प हैं, यह केवल तभी लागू किया जा सकता है जब वह धन विधेयक न हो. प्रत्येक क्रिया गुणात्मक रूप से भिन्न होती है. हालांकि, पहले में रोकने का प्रयोग रोकने की योग्यता नहीं है वह विधेयक को विधानसभा को वापस करने के लिए बाध्य है जब तक कि वह धन विधेयक न हो.

हमारा विकल्प यह है कि यदि दो व्याख्याएं संभव हैं, तो इससे सद्भाव को बढ़ावा मिलता है और ऐसे मामलों में, सदन में लौटने के विकल्प को प्राथमिकता दी जा सकती है. यदि राज्यपाल को पहले प्रावधान का उल्लेख किए बिना रोक लगाने की अनुमति दी जाती है, तो यह संघवाद के खिलाफ होगा.

राज्यपाल की भूमिका को टेकओवर नहीं कर सकते
सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह माना गया कि यदि राज्यपाल विधेयक पर अपनी स्वीकृति नहीं दे रहे हैं, तो उसे अनिवार्य रूप से विधानसभा को वापस भेजा जाना चाहिए. सीजेआई ने कहा कि जब राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बाध्य होता है तो हमारी राय से पहले, दोनों पक्ष राज्यपाल के विवेक पर एक ही निर्णय पर भरोसा करते हैं. नेबाम रेबिया, शमशेर सिंह, मध्य प्रदेश पुलिस प्रतिष्ठान फैसले में हमारा विकल्प यह है कि सामान्यतः राज्यपाल सहायता और सलाह से कार्य करते हैं और संविधान में प्रावधान है कि कुछ मामलों में वह विवेक का प्रयोग कर सकते हैं. यह स्पष्ट रूप से या परोक्ष रूप से प्रदान किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत राज्यपाल की भूमिका को टेकओवर नहीं कर सकती. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने माना ​कि राज्यपाल राज्य विधेयकों पर अनिश्चित काल तक रोक नहीं लगा सकते, लेकिन उसने राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया और कहा कि ऐसा करना शक्तियों के पृथक्करण के विरुद्ध होगा.

ऐसा निर्देश असंवैधानिक: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल द्वारा विधेयकों को मंज़ूरी देने के लिए समय-सीमा अदालत द्वारा तय नहीं की जा सकती. यह भी कहा कि मान्य स्वीकृति की अवधारणा संविधान की भावना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि संवैधानिक न्यायालय राष्ट्रपति और राज्यपाल पर विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा नहीं थोप सकते. कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु मामले में 2 जजों की पीठ द्वारा दिया गया ऐसा निर्देश असंवैधानिक है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक कोर्ट राज्यपाल के समक्ष लंबित विधेयकों को मान्य स्वीकृति नहीं दे सकते, जैसा कि 2 जजों की पीठ ने अनुच्छेद 142 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए तमिलनाडु के 10 विधेयकों को मान्य स्वीकृति प्रदान की थी. 5 जजों की संविधान पीठ ने कहा कि SC असंवैधानिक रूप से राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों का अधिग्रहण नहीं कर सकता.

सीजेआई ने कहा कि समय-सीमा लागू करना संविधान द्वारा इतनी सावधानी से संरक्षित इस लचीलेपन के बिल्कुल विपरीत होगा. मान्य सहमति की अवधारणा यह मानती है कि एक प्राधिकारी अर्थात न्यायालय किसी अन्य प्राधिकारी के स्थान पर एक और भूमिका नहीं निभा सकता है. राज्यपाल या राष्ट्रपति की राज्यपालीय शक्तियों का हड़पना संविधान की भावना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है. न्यायालय द्वारा मान्य सहमति की अवधारणा किसी अन्य प्राधिकारी की शक्तियों का अधिग्रहण है और इसके लिए अनुच्छेद 142 का उपयोग नहीं किया जा सकता.

‘व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता’
सीजेआई ने कहा कि इसलिए हमें इस न्यायालय के पूर्व उदाहरणों से विचलित होने का कोई कारण नहीं दिखता. अनुच्छेद 200 और 201 के तहत कार्यों का निर्वहन राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा न्यायोचित है. न्यायिक समीक्षा और जांच केवल तभी हो सकती है जब विधेयक कानून बन जाए.

यह सुझाव देना अकल्पनीय है कि राष्ट्रपति द्वारा सलाहकार क्षेत्राधिकार के तहत निर्दिष्ट अनुच्छेद 143 के तहत राय देने के बजाय विधेयकों को न्यायालय में लाया जा सकता है. राष्ट्रपति को हर बार जब विधेयक उनके पास भेजे जाते हैं तो उन्हें इस न्यायालय से सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है. यदि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143 के तहत सलाहकार क्षेत्राधिकार के विकल्प की आवश्यकता है, तो यह हमेशा उपलब्ध है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को उनके निर्णयों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन संवैधानिक कोर्ट उनके निर्णयों की जांच कर सकता है. हालांकि कोर्ट राज्यपाल पर कोई समय-सीमा नहीं लगा सकता. सिवाय इसके कि वह उन्हें एक उचित अवधि में निर्णय लेने के लिए कहे.

SC की बड़ी टिप्पणियां

राज्यपाल पर कोई समय-सीमा नहीं लगा सकता
राज्यपाल विधेयकों पर अनिश्चित काल तक रोक नहीं लगा सकते
राज्यपाल विधेयक पर अपनी स्वीकृति नहीं दे रहे हैं, तो उसे विधानसभा को वापस भेजा जाना चाहिए.
अदालत राज्यपाल की भूमिका को टेकओवर नहीं कर सकती
विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा नहीं थोप सकते
तमिलनाडु मामले में 2 जजों की पीठ द्वारा दिया गया ऐसा निर्देश असंवैधानिक
राष्ट्रपति ने कोर्ट से क्या जानना चाहा था?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए शीर्ष अदालत से यह जानना चाहा था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के इस्तेमाल के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समयसीमा निर्धारित की जा सकती है.

राष्ट्रपति संदर्भ का निर्णय तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों की मंजूरी को लेकर राज्यपाल की शक्तियों पर न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले के बाद आया था. पांच पन्नों के संदर्भ में मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से 14 सवाल पूछे थे और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर उसकी राय जानने की कोशिश की.

क्या है पूरा मामला?
31 अक्टूबर 2023 को तमिलनाडु सरकार ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत विभिन्न विधेयकों और अन्य प्रस्तावों को अनिश्चित काल तक लंबित रखने के राज्यपाल आरएन रवि के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. राज्य सरकार ने बताया कि चार श्रेणियों के मामले ऐसे हैं जिन्हें राज्यपाल ने बिना कोई जवाब दिए लंबित रखा है. 8 अप्रैल 2025 को न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने राज्यपाल की देरी को गलत माना. अनुच्छेद 142 के तहत विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए, पीठ ने लंबित विधेयकों को स्वीकृत मान लिया.

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