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क्या होता है ग्रीन हाइड्रोजन? माना जा रहा पेट्रोल-डीजल का दमदार विकल्प

ईरान युद्ध ने दुनियाभर को एक बार फिर पेट्रोल-डीजल के विकल्प को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया है. हाल ही में पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी की गई है. जैसे ही पेट्रोल और डीजल महंगे होता हैं, वैसे ही लोग वैकल्पिक ईंधन की ओर देखने लगते हैं. पिछले कुछ सालों में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री दुनिया भर में तेजी से बढ़ी है. इस बीच अब एक और विकल्प तेजी से चर्चा में आ रहा है और वह है हाइड्रोजन फ्यूल. कंपनियों से लेकर सरकार तक इस पर गंभीरता से काम कर रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हाइड्रोजन वास्तव में पेट्रोल-डीजल का भविष्य बन सकता है?

क्या होता है हाइड्रोजन फ्यूल?
हाइड्रोजन कोई नई तकनीक नहीं है. इस पर लंबे समय से रिसर्च चल रही है, लेकिन अब इसकी चर्चा इसलिए बढ़ गई है क्योंकि इसे क्लीन एनर्जी के रूप में देखा जा रहा है. वाहनों में इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल (FCEV) तकनीक में किया जाता है. इस तकनीक में हाइड्रोजन, ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करके बिजली पैदा करती है और वाहन को ऊर्जा देती है. इसकी सबसे बड़ी खास बात यह है कि इससे धुआं या जहरीली गैस नहीं निकलती. इसमें वेस्टेज के रूप में सिर्फ पानी या भाप आता है.

ग्रीन हाइड्रोजन को सबसे स्वच्छ विकल्प माना जाता है. दूसरी तरफ ग्रे और ब्लू हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन से बनाई जाती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन ज्यादा होता है. यानी अगर हाइड्रोजन को वास्तव में पर्यावरण के अनुकूल बनाना है तो ग्रीन हाइड्रोजन को सस्ता और बड़े स्तर पर उपलब्ध बनाना होगा.

किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा काम आ सकता है हाइड्रोजन?
अक्सर लोग सोचते हैं कि हाइड्रोजन सभी वाहनों के लिए एक जैसा समाधान है, लेकिन ऐसा नहीं है. बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों की तरह हाइड्रोजन हर जगह फिट नहीं बैठता. विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोजन उन क्षेत्रों में ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है जहां भारी बैटरियां समस्या बन जाती हैं या लंबी दूरी तय करनी होती है.

भारत हाइड्रोजन को लेकर क्या कर रहा है?
भारत ने हाइड्रोजन सेक्टर में शुरुआती कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं. साल 2023 में सरकार ने नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन लॉन्च किया था. इस मिशन के तहत करीब 19,744 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया. सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक हर साल 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन किया जाए. इसके अलावा देश के कई बंदरगाह आधारित हब जैसे तूतीकोरिन, पारादीप और कांडला को हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है. दूसरी तरफ निजी और सरकारी कंपनियां भी इस दिशा में तेजी से काम कर रही हैं. JSW ने 2025 के आखिर में 3,600 MTPA क्षमता की यूनिट शुरू की थी. वहीं GAIL और NTPC शहरों के गैस नेटवर्क में हाइड्रोजन पर काम कर रहे हैं.

हाइड्रोजन के सामने अभी भी कई बड़ी चुनौतियां
भले ही हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन कहा जा रहा हो, लेकिन इसके सामने कई बड़ी मुश्किलें अभी मौजूद हैं. ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने की लागत अभी बहुत ज्यादा है. इसके अलावा हाइड्रोजन का घनत्व कम होने के कारण उसका स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट भी चुनौतीपूर्ण है. देश में फिलहाल हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन लगभग नहीं के बराबर हैं. इसके साथ ही पूरी सप्लाई चेन में होने वाले नुकसान के कारण इसकी कैपेसिटी भी इलेक्ट्रिक वाहनों से कम मानी जाती है. यही कारण है कि आम कार खरीदारों के लिए निकट भविष्य में बैटरी EV ज्यादा व्यावहारिक विकल्प दिखाई देते हैं.

क्या सच में भविष्य का ईंधन बनेगा हाइड्रोजन?
हाइड्रोजन रातोंरात पेट्रोल, डीजल या इलेक्ट्रिक वाहनों की जगह नहीं लेने वाला. लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी सही नहीं होगा. जब दुनिया तेल की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब हाइड्रोजन एक रणनीतिक विकल्प बनकर उभर सकता है. भारत के लिए इसकी असली ताकत आज आम कारों में नहीं बल्कि आने वाले कल की ऊर्जा सुरक्षा में छिपी है. अगर इसकी लागत कम होती है, बुनियादी ढांचा मजबूत बनता है और ग्रीन हाइड्रोजन बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो जाती है, तो आने वाले वर्षों में यह भारत की स्वच्छ परिवहन नीति का अहम हिस्सा बन सकता है.

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