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छत्तीसगढ़ आबकारी का ‘प्लास्टिक कार्ड’ फेल: 65% घटा उत्पादन, लड़खड़ाई सप्लाई चेन

रायपुर। छत्तीसगढ़ में शराब बिक्री के लिए कांच की जगह प्लास्टिक (फाइबर) बोतलों का इस्तेमाल करने का आबकारी विभाग का फैसला अब विभाग और डिस्टलरी संचालकों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद देशी शराब का उत्पादन करीब 65 फीसदी तक प्रभावित हो गया है, जबकि बाजार में कई लोकप्रिय ब्रांड की कमी भी देखने को मिल रही है।

1 अप्रैल से लागू हुई नई व्यवस्था

आबकारी विभाग ने नए वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से राज्य में देशी शराब की बिक्री प्लास्टिक (फाइबर) बोतलों में करने का निर्णय लिया था। विभाग का तर्क था कि प्लास्टिक बोतलें हल्की होती हैं, टूटती नहीं हैं और परिवहन लागत भी कम होती है। लेकिन यह प्रयोग अब व्यावहारिक स्तर पर विफल होता नजर आ रहा है।

बॉटलिंग सिस्टम बना सबसे बड़ी समस्या

सूत्रों के अनुसार, राज्य की पांच प्रमुख डिस्टलरीज में शराब भरने की पूरी मशीनरी कांच की बोतलों के हिसाब से डिजाइन की गई थी। प्लास्टिक बोतलें हल्की होने के कारण कन्वेयर सिस्टम पर स्थिर नहीं रह पा रही हैं और बार-बार गिर रही हैं। इसका सीधा असर उत्पादन क्षमता पर पड़ा है।

जानकारी के मुताबिक जहां पहले एक घंटे में 100 कांच की बोतलों में शराब भरी जाती थी, वहीं अब प्लास्टिक बोतलों में केवल 20 बोतलें ही भर पा रही हैं। यही वजह है कि देशी शराब का उत्पादन और सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो गई है।

शराब प्रेमियों को नहीं मिल रहे पसंदीदा ब्रांड

उत्पादन घटने का असर बाजार में भी दिखाई देने लगा है। कई दुकानों में देशी शराब के लोकप्रिय ब्रांड उपलब्ध नहीं हैं, जिससे उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

विभाग ने फिर मांगी कांच की बोतलों में सप्लाई

स्थिति बिगड़ने के बाद आबकारी विभाग ने हाल ही में शराब निर्माताओं की बैठक बुलाई। बैठक में कंपनियों को सप्लाई बढ़ाने के निर्देश दिए गए। साथ ही विभाग ने अस्थायी राहत देते हुए निर्माताओं से 31 मई तक कांच की बोतलों में ही शराब सप्लाई जारी रखने को कहा है।

कांच बनाम प्लास्टिक: कौन बेहतर?

विशेषज्ञों के अनुसार, कांच की बोतलें शराब भंडारण के लिए अधिक सुरक्षित मानी जाती हैं क्योंकि कांच रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करता और शराब की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है। वहीं प्लास्टिक बोतलों में लंबे समय तक शराब रखने या अधिक तापमान में कुछ रसायन घुलने की आशंका रहती है, जिससे स्वाद और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि प्लास्टिक बोतलें हल्की और सस्ती होती हैं, लेकिन मौजूदा हालात ने यह साफ कर दिया है कि बिना तकनीकी तैयारी के किया गया बदलाव उद्योग और सप्लाई सिस्टम पर भारी पड़ सकता है।

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