नई दिल्ली। भारत सरकार देश के बढ़ते आयात बिल और घटते विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) को संभालने के लिए एक मास्टर प्लान पर काम कर रही है। सरकार जल्द ही संशोधित ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ (GMS) ला सकती है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य घरों और लॉकरों में बेकार पड़े सोने को बैंकिंग सिस्टम में लाना है, ताकि सोने के आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
क्या है सरकार की योजना?
इस स्कीम के तहत आम नागरिक अपना सोना बैंकों में जमा कर सकेंगे। सरकार इस सोने का उपयोग ज्वेलरी निर्यातकों और घरेलू निर्माताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए करेगी। इससे देश को बाहर से सोना नहीं खरीदना पड़ेगा और कीमती विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
योजना की प्रस्तावित मुख्य बातें:
- न्यूनतम जमा: कम से कम 10 ग्राम सोना जमा करना अनिवार्य होगा।
- अवधि: सोने को 1 साल से लेकर 16 साल तक की अवधि के लिए जमा किया जा सकेगा।
- ब्याज दर: लंबी अवधि के लिए जमा सोने पर 2.5% से 3% तक सालाना ब्याज मिलने की उम्मीद है।
- वापसी: मैच्योरिटी के बाद जमाकर्ता को उसका सोना (या उसकी तत्कालीन वैल्यू) वापस मिल जाएगी।
आयात का बढ़ता बोझ और पीएम की अपील
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने रिकॉर्ड 72 अरब डॉलर मूल्य के सोने का आयात किया है। इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की थी। हालांकि, सराफा कारोबारियों ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि इस क्षेत्र से लाखों कारीगरों की रोजी-रोटी जुड़ी है।
विशेषज्ञों की राय: “भारत के घरों में लगभग 30,000 टन सोना जमा है। यदि इस स्कीम के जरिए केवल 2,000 टन सोना भी सिस्टम में आ जाता है, तो अगले तीन वर्षों तक भारत को सोने के आयात की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
चुनौतियां और जोखिम
जानकारों का मानना है कि इस स्कीम में सरकार के लिए वित्तीय जोखिम भी है। चूंकि सोने की कीमतें लगातार बढ़ती रहती हैं, इसलिए तीन साल पहले जमा किए गए सोने को वापस करते समय सरकार को बाजार भाव के अनुसार बहुत अधिक भुगतान करना पड़ सकता है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ने की संभावना रहती है।










