Trendingछत्तीसगढबड़ी खबर

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कोटवारी जमीन पर कोटवार या उनके उत्तराधिकारी नहीं कर सकते मालिकाना हक का दावा

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की पूर्णपीठ (फुल बेंच) ने कोटवारों और उनके उत्तराधिकारियों की सेवा भूमि (कोटवारी/कोतवाली जमीन) को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जमींदारी उन्मूलन से पहले मालगुजारों या जमींदारों द्वारा कोटवारों को सेवा के बदले दी गई जमीन पर कोटवार या उनके कानूनी वारिस मालिकाना हक (भूस्वामी अधिकार) का दावा नहीं कर सकते।

केवल सेवा और दायित्वों के निर्वहन के लिए है जमीन

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली फुल बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि कोटवारों को दी गई ‘सेवा भूमि’ का मुख्य उद्देश्य केवल राजस्व एवं ग्राम सेवा से जुड़े दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन सुनिश्चित करना था। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा:

“केवल लंबे समय से कब्जा होने या उत्तराधिकार के आधार पर सेवा भूमि पर मालिकाना हक स्थापित नहीं किया जा सकता। ऐसी जमीन का मूल स्वरूप ‘सेवा भूमि’ का ही रहेगा और उस पर भूस्वामी का अधिकार नहीं माना जाएगा।”

भविष्य के मामलों के लिए बनेगी कानूनी मिसाल

अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ़ किया है कि सेवा भूमि से जुड़े जितने भी विवाद हैं, उनका निपटारा संबंधित कानूनों और राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) में दर्ज प्रविष्टियों के आधार पर ही किया जाएगा।

इस फैसले का असर पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश में लंबित पड़े ऐसे दर्जनों मामलों पर पड़ेगा, जहाँ कोटवारी जमीन पर स्वामित्व का दावा किया जा रहा था। इस निर्णय को कोटवारी ज़मीन विवादों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल (Precedent) माना जा रहा है, जिससे भविष्य में राजस्व अधिकारियों और अधीनस्थ अदालतों को फ़ैसले लेने में स्पष्ट दिशा मिलेगी।

Related Posts

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में छत्तीसगढ़ ने रचा इतिहास: विधानसभा से पास हुआ विधेयक; 15 लाख MSMEs को मिलेगी बड़ी राहत

रायपुर। छत्तीसगढ़ उद्योग और निवेश के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम करने की दिशा…

1 of 432