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मेरिल लाइफ साइंसेज के हार्ट स्टेंट पर श्रीलंका में सवाल: भारत में बिक रहे उत्पाद कितने सुरक्षित? मरीजों की जान और देश की साख दांव पर!

भारत में चिकित्सा उपकरणों की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। भारतीय मेडिकल डिवाइस कंपनी मेरिल लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड के तीन ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट मॉडल को श्रीलंका में गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के चलते वापस लेने की खबरों के बाद अब भारत में भी इन उपकरणों की सुरक्षा को लेकर जांच की मांग उठी है। इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कंपनी के कुछ स्टेंट मॉडल की गुणवत्ता पर विदेश में सवाल उठे हैं, तो क्या भारत में बिक रहे उन्हीं मॉडलों और कंपनी के दूसरे उत्पादों की सुरक्षा की भी जांच नहीं होनी चाहिए?

मामला केवल एक कंपनी या तीन उत्पादों तक सीमित नहीं है। यह उन हजारों मरीजों की जिंदगी से जुड़ा है, जिनके दिल की धमनियों में स्टेंट लगाकर उन्हें बेहतर जीवन देने की उम्मीद की जाती है। ऐसे में किसी भी तरह की गुणवत्ता संबंधी शिकायत को हल्के में लेना मरीजों की सुरक्षा के साथ जोखिम लेने जैसा हो सकता है।

श्रीलंका में क्यों उठे स्टेंट की गुणवत्ता पर सवाल?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, श्रीलंका की राष्ट्रीय औषधि नियामक प्राधिकरण (NMRA) ने जून 2026 में मेरिल लाइफ साइंसेज के तीन ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट मॉडल को वापस लेने के निर्देश दिए थे। बताया गया है कि वहां मेडिकल डिवाइस इवैल्यूएशन कमेटी (MDEC) की जांच के बाद इन उपकरणों को लेकर कुछ गंभीर चिंताएं सामने आईं।

रिपोर्टों में स्टेंट को सही जगह पर स्थापित करने में परेशानी, प्रत्यारोपण के बाद उसके खिसकने, स्टेंट के भीतर अचानक खून का थक्का बनने और पर्याप्त रूप से फैल नहीं पाने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है।

इनमें सबसे गंभीर स्थिति एक्यूट स्टेंट थ्रोम्बोसिस की है। इसमें स्टेंट के भीतर अचानक खून का थक्का बन सकता है, जिससे हृदय तक रक्त पहुंचने में रुकावट पैदा हो सकती है। गंभीर मामलों में यह हार्ट अटैक का कारण बन सकता है और मरीज को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक, इन खामियों के कारण अतिरिक्त उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे इलाज में कीमती समय लगा और खर्च भी बढ़ा।

हालांकि, इन रिपोर्टों के आधार पर कंपनी के सभी उत्पादों को खराब घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन जिन मॉडलों को लेकर सवाल उठे हैं, उनकी गुणवत्ता, संबंधित शिकायतों और नियामकीय कार्रवाई की स्वतंत्र जांच जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल: अगर विदेश में गुणवत्ता पर सवाल, तो भारत में बिक रहे उत्पाद कितने सुरक्षित?

इस पूरे मामले में भारत के मरीजों के लिए सबसे अहम सवाल यही है। यदि किसी भारतीय कंपनी के कुछ स्टेंट मॉडल को विदेश में गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के चलते वापस लेने की कार्रवाई हुई है, तो भारतीय स्वास्थ्य नियामकों को यह पता लगाना चाहिए कि क्या वही मॉडल भारत में भी बेचे जा रहे हैं या मरीजों में लगाए जा चुके हैं।

यदि वही मॉडल भारतीय बाजार में उपलब्ध हैं, तो उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा का तत्काल आकलन किया जाना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि विदेश में सामने आई शिकायतें किसी विशेष बैच, निर्माण संबंधी समस्या, डिजाइन, इस्तेमाल की प्रक्रिया या किसी अन्य कारण से जुड़ी थीं।

साथ ही, कंपनी के अन्य स्टेंट मॉडल की गुणवत्ता की समीक्षा भी जोखिम के आकलन के आधार पर की जानी चाहिए। केवल इसलिए कि तीन मॉडलों को लेकर सवाल उठे हैं, कंपनी के सभी उत्पादों को असुरक्षित नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि बाकी सभी उत्पाद स्वतः सुरक्षित हैं।

सवाल यह नहीं कि किसी कंपनी को दोषी मान लिया जाए; सवाल यह है कि जब मरीजों की जिंदगी से जुड़ा उपकरण विदेश में जांच के दायरे में आए, तो भारत में उसकी सुरक्षा की पुष्टि करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

स्वास्थ्य मंत्रालय और संबंधित नियामक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारतीय मरीजों को उपलब्ध स्टेंट की गुणवत्ता का आकलन पारदर्शी तरीके से हो और जरूरत पड़ने पर संबंधित उत्पादों या बैचों पर समय रहते कार्रवाई की जाए।

क्या केवल विदेश में पकड़ी गई खामी के बाद ही जागेगा भारतीय सिस्टम?

इस मामले में एक बड़ा सवाल भारत की चिकित्सा उपकरण निगरानी व्यवस्था पर भी है। क्या भारतीय नियामक संस्थाओं के पास ऐसी प्रभावी व्यवस्था है, जिसके तहत विदेश में किसी मेडिकल डिवाइस के खिलाफ जारी सुरक्षा चेतावनी, रिकॉल या वापसी के आदेश की जानकारी मिलते ही भारत में उसकी स्थिति की समीक्षा की जा सके?

यदि किसी देश में किसी स्टेंट को लेकर गंभीर शिकायत सामने आती है, तो भारतीय नियामकों को यह पता लगाने में देरी नहीं होनी चाहिए कि संबंधित उत्पाद देश में उपलब्ध है या नहीं, उसकी कितनी इकाइयां बेची गई हैं, कितने मरीजों में उसका इस्तेमाल हुआ है और क्या भारतीय मरीजों में भी इसी तरह की जटिलताएं सामने आई हैं।

इस मामले में राज्यसभा सदस्य एवं चिकित्सक अजीत माधव गोपछड़े ने भी चिंता जताई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने 5 अक्टूबर 2026 को इस विषय में प्रतिनिधित्व दिया, जिसके बाद कैबिनेट सचिवालय ने स्वास्थ्य मंत्रालय से मामले की जांच करने को कहा।

गोपछड़े ने मेडिकल डिवाइस की कठोर जांच, स्टेंट लगाने के निर्णय की उचित चिकित्सकीय समीक्षा और प्रत्यारोपण के बाद होने वाली जटिलताओं की निगरानी मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है।

उनका उठाया गया मुद्दा व्यापक महत्व रखता है। किसी मेडिकल डिवाइस को नियामकीय मंजूरी मिल जाना ही उसकी सुरक्षा की निगरानी का अंतिम चरण नहीं हो सकता। वास्तविक मरीजों में इस्तेमाल के बाद सामने आने वाली समस्याओं पर भी लगातार नजर रखना जरूरी है।

विदेश में भारतीय उत्पादों पर सवाल, तो देश की छवि पर भी असर

भारत आज दुनिया के सामने मेडिकल डिवाइस निर्माण और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। भारतीय कंपनियों के उत्पाद विदेशों में इस्तेमाल होते हैं, तो उनके साथ देश की औद्योगिक क्षमता, तकनीकी गुणवत्ता और नियामकीय व्यवस्था की प्रतिष्ठा भी जुड़ती है।

ऐसे में यदि भारतीय कंपनी के चिकित्सा उपकरणों को किसी विदेशी बाजार में गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के कारण वापस लेने की खबर आती है, तो उसका असर केवल संबंधित कंपनी तक सीमित रहने की आशंका नहीं होती। इससे भारतीय मेडिकल डिवाइस उद्योग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

विदेशी बाजारों में किसी उत्पाद के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई अपने आप में पूरे भारतीय उद्योग की गुणवत्ता पर फैसला नहीं है। लेकिन यदि ऐसी शिकायतों की जांच पारदर्शी तरीके से नहीं होती, समस्याओं के कारणों का पता नहीं लगाया जाता और सुधारात्मक कदम सामने नहीं आते, तो भारत में निर्मित चिकित्सा उपकरणों पर अंतरराष्ट्रीय भरोसा प्रभावित हो सकता है।

इसलिए सरकार के सामने दोहरी जिम्मेदारी है—एक तरफ भारतीय मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दूसरी तरफ यह दिखाना कि भारत में निर्मित मेडिकल डिवाइस गुणवत्ता के मामले में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मानक से कम नहीं हैं।

देश की छवि केवल उत्पादों के विदेशों में बिकने से नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि गुणवत्ता पर सवाल उठने पर संबंधित कंपनी और नियामक संस्थाएं कितनी गंभीरता, पारदर्शिता और जिम्मेदारी से कार्रवाई करती हैं।

स्टेंट की गुणवत्ता में गड़बड़ी का मतलब सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं

कोरोनरी स्टेंट छोटे जालीदार उपकरण होते हैं, जिन्हें हृदय की संकरी या अवरुद्ध धमनियों में लगाया जाता है, ताकि रक्त का प्रवाह बेहतर हो सके। एंजियोप्लास्टी के दौरान इस्तेमाल होने वाले ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट धीरे-धीरे दवा छोड़ते हैं, जिससे धमनी के दोबारा संकरा होने का जोखिम कम करने में मदद मिलती है।

इन उपकरणों की गुणवत्ता में कमी या प्रत्यारोपण के दौरान होने वाली जटिलताएं मरीज के इलाज को प्रभावित कर सकती हैं। यदि स्टेंट सही तरीके से न खुले, अपनी जगह से खिसक जाए या उसके भीतर खून का थक्का बन जाए, तो मरीज को अतिरिक्त उपचार की जरूरत पड़ सकती है। कुछ स्थितियों में ये जटिलताएं जानलेवा भी हो सकती हैं।

इसके अलावा, अतिरिक्त उपकरणों का इस्तेमाल, दोबारा प्रक्रिया कराने की जरूरत, अस्पताल में अधिक समय तक रहना और इलाज का बढ़ता खर्च मरीज तथा उसके परिवार पर आर्थिक और मानसिक दबाव डाल सकता है।

इसीलिए इस तरह के मामले में केवल कंपनी की सफाई या उत्पाद की शुरुआती मंजूरी पर निर्भर रहने के बजाय उपलब्ध शिकायतों, तकनीकी जांच और मरीजों के उपचार संबंधी आंकड़ों की समीक्षा जरूरी है।

सरकार को किन सवालों के जवाब देने चाहिए?

इस मामले में स्वास्थ्य मंत्रालय और संबंधित चिकित्सा उपकरण नियामकों को कुछ बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने रखनी चाहिए।

भारतीय बाजार में उपलब्धता: श्रीलंका में जिन तीन स्टेंट मॉडलों को लेकर कार्रवाई की खबर है, क्या वे भारत में भी बेचे जा रहे हैं?
उत्पादों की गुणवत्ता: क्या संबंधित मॉडलों और जोखिम के आधार पर कंपनी के अन्य उत्पादों की स्वतंत्र तकनीकी जांच की जाएगी?
मरीजों की सुरक्षा: क्या इन स्टेंटों को भारत में लगवाने वाले मरीजों की संख्या, शिकायतों और संभावित जटिलताओं का आकलन किया जाएगा?
बैच और निर्माण प्रक्रिया: क्या शिकायतें किसी खास बैच या निर्माण संबंधी समस्या से जुड़ी हैं, और क्या ऐसे बैचों की पहचान की जा सकती है?
विदेशी चेतावनियों पर कार्रवाई: क्या विदेश में मेडिकल डिवाइस के खिलाफ जारी रिकॉल या सुरक्षा चेतावनी मिलने पर भारत में स्वतः समीक्षा करने की प्रभावी व्यवस्था है?
पारदर्शिता और जवाबदेही: जांच में कोई खामी सामने आती है, तो क्या नियामक निष्कर्ष, मरीजों की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम और जरूरी सुधार सार्वजनिक किए जाएंगे?

इन सवालों का जवाब देना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि चिकित्सा उपकरणों की सुरक्षा का आकलन केवल निर्माता के दावों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणों, परीक्षणों और वास्तविक उपयोग से प्राप्त जानकारी के आधार पर होना चाहिए।

मरीजों को क्या करना चाहिए?

जिन मरीजों के शरीर में पहले से स्टेंट लगाया जा चुका है, उन्हें केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर घबराने या अपनी दवाएं बंद करने की जरूरत नहीं है। उन्हें अपने उपचार करने वाले हृदय रोग विशेषज्ञ से स्टेंट के मॉडल और उपलब्ध सुरक्षा संबंधी जानकारी पर चर्चा करनी चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं बंद करना या उपचार में बदलाव करना नुकसानदायक हो सकता है।

यदि स्टेंट लगवाने के बाद सीने में तेज या नया दर्द, सांस लेने में परेशानी या हार्ट अटैक जैसे लक्षण सामने आएं, तो तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

वहीं, यदि किसी विशेष उत्पाद के खिलाफ आधिकारिक सुरक्षा चेतावनी जारी होती है, तो मरीजों और डॉक्टरों को उसके अनुरूप संबंधित नियामक तथा चिकित्सकीय सलाह का पालन करना चाहिए।

श्रीलंका में भारतीय कंपनी के तीन स्टेंट मॉडलों को लेकर सामने आई खबरें एक महत्वपूर्ण अवसर हैं कि भारत अपनी मेडिकल डिवाइस निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीरता से विचार करे। यहां सवाल किसी कंपनी को बिना जांच दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि संभावित खामियों की निष्पक्ष पड़ताल करने और मरीजों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का है।

यदि संबंधित उत्पादों में गुणवत्ता संबंधी समस्या प्रमाणित होती है, तो उसके कारणों की पहचान, प्रभावित बैचों की समीक्षा और जरूरी सुधारात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। यदि अन्य उत्पादों की सुरक्षा पर भी कोई ठोस संदेह सामने आता है, तो उनकी जांच से पीछे नहीं हटना चाहिए। और यदि जांच में उत्पाद सुरक्षित पाए जाते हैं, तो वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर यह बात भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।

आखिरकार, मेडिकल डिवाइस के मामले में न तो कंपनी की प्रतिष्ठा सुरक्षा का प्रमाण है और न ही विदेशी बाजार में हुई कार्रवाई अपने आप में दोष सिद्ध करती है। निर्णायक चीज है निष्पक्ष जांच और विश्वसनीय सबूत।

भारत के मरीजों को सुरक्षित इलाज मिलना चाहिए और दुनिया को भारतीय चिकित्सा उपकरणों की गुणवत्ता पर भरोसा होना चाहिए। इन दोनों उद्देश्यों को पूरा करने का रास्ता एक ही है—समय पर जांच, पारदर्शी कार्रवाई और मरीजों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं।

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