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बेटे को मां ने दी किडनी, ब्लड ग्रुप अलग होने के बावजूद AIIMS रायपुर में सफल ट्रांसप्लांट

रायपुर | राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के डॉक्टरों ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। एम्स की टीम ने एक ऐसे युवक का किडनी प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किया है, जिसका ब्लड ग्रुप उसके डोनर (मां) से मेल नहीं खा रहा था। 59 वर्षीय मां ने ‘मिसमैच’ ब्लड ग्रुप के बावजूद अपने 30 साल के बेटे को अपनी किडनी दान कर नया जीवन दिया है।

केस की संवेदनशीलता: जब उम्मीदें टूटने लगी थीं

सुपेला, भिलाई का रहने वाला यह मरीज ‘एंड स्टेज’ किडनी डिजीज से जूझ रहा था और बीते एक महीने से डायलिसिस पर था। डॉक्टरों ने बताया कि मरीज का ब्लड ग्रुप O-पॉजिटिव था। मां का ब्लड ग्रुप A-पॉजिटिव था। समान रक्त समूह का डोनर न मिलने के कारण युवक का जीवन खतरे में था।

जटिल ‘ABO इनकंपीटेबल’ तकनीक का सहारा

आमतौर पर समान ब्लड ग्रुप में ही ट्रांसप्लांट संभव होता है, लेकिन एम्स के नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी विभाग ने ‘एबीओ इनकंपीटेबल’ सर्जरी का फैसला लिया। इस जटिल प्रक्रिया को इस तरह अंजाम दिया गया। मरीज के शरीर में मां के अलग ब्लड ग्रुप को स्वीकार करने के लिए ‘रिटुक्सिमैब’ दवा दी गई। पांच बार प्लाज्माफेरेसिस कर खून से उन एंटीबॉडीज को निकाला गया जो ट्रांसप्लांट में बाधक बन सकती थीं। नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी, एनेस्थीसिया और ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने मिलकर इस ऑपरेशन को सफल बनाया।

सरकारी क्षेत्र में एम्स रायपुर किडनी ट्रांसप्लांट के मामले में छत्तीसगढ़ का अग्रणी संस्थान बन चुका है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 100 के करीब सफल ट्रांसप्लांट अब तक संस्थान में लगभग 107 सफल ऑपरेशन हो चुके हैं। 95 मरीजों को उनके परिजनों के माध्यम से किडनी मिली। 12 मरीजों को अंगदान के जरिए नई जिंदगी मिली।

डॉ. विनय राठौर (नेफ्रोलॉजी विभाग) ने बताया कि यह तकनीक उन लोगों के लिए उम्मीद की किरण है जिन्हें अपने ही ब्लड ग्रुप का डोनर नहीं मिल पाता। वहीं, डॉ. अमित शर्मा ने कहा कि सर्जरी के बाद 10 दिनों तक मरीज को गहन निगरानी (ICU) में रखा गया, जिसके बाद उसे पूरी तरह स्वस्थ होने पर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

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