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नकटी लैंड डील: विधायक आवास परियोजना से पहले किसने खरीदी नकटी की जमीन? राजस्व दस्तावेजों से उठे बड़े सवाल

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले नया रायपुर से लगे ग्राम नकटी की जमीनें प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक कहानी बनती नजर आ रही हैं। जिस गांव में सरकार विधायकों के लिए नई आवासीय कॉलोनी विकसित करने जा रही है और जहां हाल ही में लगभग 80 परिवारों से अतिक्रमण हटाया गया, उसी गांव की कुछ भूमि के राजस्व रिकॉर्ड अब कई राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़े कर रहे हैं।

सरकार की प्रस्तावित विधायक आवास परियोजना को प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण सरकारी प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। परियोजना पूरी होने के बाद यह क्षेत्र नए वीआईपी जोन के रूप में विकसित होगा, जहां विधायक, मंत्री और अन्य संवैधानिक पदाधिकारी निवास करेंगे। इसके साथ ही करोड़ों रुपये की सरकारी अधोसंरचना विकसित होगी, जिससे आसपास की जमीनों के मूल्य में वृद्धि की संभावना स्वाभाविक मानी जा रही है।

इसी बीच वर्ष 2024-25 के बी-1 और पी-2 राजस्व अभिलेखों में ग्राम नकटी, जिला एवं तहसील रायपुर, हल्का नंबर 00077 की कुल 1.0520 हेक्टेयर (करीब 2.60 एकड़) भूमि अलका डेवलपर्स के नाम दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। अभिलेखों में “अलका डेवलपर्स द्वारा अधिकृत शौर्य सिंह सिसोदिया, पिता वी.के. सिसोदिया” का उल्लेख है। संबंधित खाते में खसरा नंबर 656/1, 656/2, 657/1, 657/2, 658, 659/1, 661 और 662 दर्ज हैं।

मामले ने इसलिए राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया है क्योंकि वी.के. सिसोदिया वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के ओएसडी हैं। सार्वजनिक रूप से यह भी ज्ञात है कि वे करीब दो दशकों से डॉ. रमन सिंह के साथ प्रशासनिक भूमिका में जुड़े रहे हैं।

दूसरी ओर, स्वयं डॉ. रमन सिंह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि नकटी में विधायक आवास बसाने की योजना नई नहीं, बल्कि 10 से 15 वर्ष पुरानी है। इसी बयान के बाद यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि परियोजना लंबे समय से विचाराधीन थी तो उस समय इसकी जानकारी किस स्तर तक उपलब्ध थी और क्या भूमि खरीद उस प्रस्तावित परियोजना से पहले हुई थी या बाद में।

इसी आधार पर परियोजना की आधिकारिक टाइमलाइन सार्वजनिक करने की मांग उठाई जा रही है। सवाल यह भी है कि क्या विधायक आवास परियोजना की घोषणा या अंतिम निर्णय से पहले इस क्षेत्र में प्रभावशाली लोगों से जुड़े परिवारों द्वारा जमीन खरीदी गई थी, या यह महज एक संयोग है।

हालांकि उपलब्ध दस्तावेज केवल भूमि स्वामित्व और राजस्व रिकॉर्ड की जानकारी देते हैं। इनसे किसी प्रकार की अनियमितता या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि नहीं होती। ऐसे में अब निगाहें सरकार और संबंधित पक्षों के स्पष्टीकरण पर टिकी हैं।

मांग की जा रही है कि यदि भूमि खरीद पूरी तरह वैधानिक और सामान्य प्रक्रिया के तहत हुई है, तो उसकी खरीद की तारीख, परियोजना की स्वीकृति की समयरेखा और अन्य संबंधित तथ्य सार्वजनिक किए जाएं, ताकि किसी भी संभावित हितों के टकराव की आशंका समाप्त हो सके।

साथ ही कुछ लोगों ने यह भी मांग उठाई है कि यदि आवश्यक हो तो मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए, जिससे पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट हो सके।

सोमवार से शुरू हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में यह मुद्दा सदन में गूंज सकता है। अब देखना होगा कि क्या विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय इस पूरे मामले पर अपना पक्ष रखता है और क्या सरकार परियोजना की पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक कर इन सवालों का जवाब देती है।

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