बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के गिफ्ट यानी हिबा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल गिफ्ट डीड का पंजीकरण करा देने से मुस्लिम कानून के तहत हिबा वैध नहीं हो जाता।
कोर्ट ने कहा कि वैध हिबा के लिए दान की स्पष्ट घोषणा, प्राप्तकर्ता की स्वीकृति और संपत्ति का वास्तविक कब्जा सौंपना आवश्यक है। अदालत ने रायपुर की 1500 वर्गफीट जमीन से जुड़े मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए गिफ्ट डीड को अमान्य मानने के निर्णय के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।
रायपुर की 1500 वर्गफीट जमीन से जुड़ा है मामला
मामला रायपुर के रानी दुर्गावती वार्ड स्थित खानिज नगर, पुरैना तेलीबांधा की 1500 वर्गफीट जमीन से जुड़ा है।
नसीमा अली ने अपने दो नाबालिग बच्चों के साथ सिविल कोर्ट में दावा दायर कर 27 मार्च 2019 को किए गए गिफ्ट डीड को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उनके पति स्वर्गीय नौशाद अली ने जमीन खरीदने और उस पर मकान बनाने के लिए रकम खर्च की थी।
पति की मौत के बाद भी नसीमा और उनके बच्चे संपत्ति के करीब 370 वर्गफीट हिस्से में बने मकान में रह रहे थे। आरोप था कि इसके बावजूद परिवार के कुछ सदस्यों ने पूरी संपत्ति का गिफ्ट डीड अपने नाम करा लिया और उन्हें संपत्ति से बेदखल करने का प्रयास किया।
गिफ्ट लेने वालों ने भी रखी अपनी दलील
दूसरी ओर, गिफ्ट लेने वाले पक्ष ने दावा किया कि संबंधित संपत्ति उसके मालिक ने अपनी आय से खरीदी थी और वह उसका एकमात्र मालिक था। इसलिए उसे संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति को गिफ्ट करने का पूरा अधिकार था।
उनकी ओर से यह भी कहा गया कि गिफ्ट डीड के बाद संपत्ति का कब्जा उन्हें सौंप दिया गया था और नसीमा व उनके बच्चे बिना किसी अधिकार के वहां रह रहे थे।
मुस्लिम कानून में हिबा की वैधता के लिए तीन चीजें जरूरी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत हिबा की वैधता के लिए केवल गिफ्ट डीड का पंजीकरण पर्याप्त नहीं है।
अदालत के अनुसार, वैध हिबा के लिए मुख्य रूप से:
- दान या गिफ्ट की स्पष्ट घोषणा
- प्राप्तकर्ता की स्वीकृति
- संपत्ति का वास्तविक कब्जा प्राप्तकर्ता को सौंपना
जरूरी है।
कोर्ट ने यह भी पाया कि संबंधित गिफ्ट डीड में चार लोगों के पक्ष में संपत्ति हस्तांतरित किए जाने का उल्लेख था, लेकिन उनके हिस्से स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किए गए थे।
गिफ्ट डीड में कब्जा देने का उल्लेख ही पर्याप्त प्रमाण नहीं
हाईकोर्ट ने मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह माना कि गिफ्ट डीड के बाद भी नसीमा और उनके बच्चे करीब 370 वर्गफीट हिस्से पर लगातार कब्जे में रहे।
गिफ्ट लेने वाला पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि पूरी संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा उसे सौंप दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि केवल गिफ्ट डीड में कब्जा सौंपने का उल्लेख कर देना इस बात का निर्णायक प्रमाण नहीं है कि वास्तविक कब्जा भी हस्तांतरित कर दिया गया था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय से संपत्ति पर रह रहे व्यक्ति को केवल गिफ्ट डीड के आधार पर जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।
‘खुद कानून हाथ में लेकर कब्जा नहीं छीना जा सकता’
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को संपत्ति पर बेहतर अधिकार होने का दावा है तो उसे कानून के तहत उचित राहत के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाना होगा।
किसी व्यक्ति को खुद कानून हाथ में लेकर दूसरे पक्ष को संपत्ति से बेदखल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार, अपील खारिज
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस निष्कर्ष को सही माना, जिसमें 27 मार्च 2019 के गिफ्ट डीड को नसीमा अली और उनके बच्चों के अधिकारों के विरुद्ध शून्य और गैर-बाध्यकारी माना गया था।
अदालत ने संपत्ति पर नसीमा और उनके बच्चों के कब्जे में हस्तक्षेप करने तथा संपत्ति के संबंध में किसी तीसरे पक्ष के पक्ष में अधिकार बनाने पर रोक लगाने वाले आदेश को भी बरकरार रखा।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने गिफ्ट डीड को चुनौती देने वाले मामले में दायर अपील को खारिज कर दिया।
यह फैसला मुस्लिम कानून के तहत हिबा की वैधता और संपत्ति के वास्तविक कब्जे को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है।









