रायपुर: रायपुर में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक के लोकसभा में पारित न होने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। लोकसभा में ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026’ को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के बाद अब इसका असर राज्यों की राजनीति में भी साफ दिखने लगा है। छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस आमने-सामने आ गए हैं और एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगा रहे हैं।
बीजेपी का कांग्रेस पर हमला
भारतीय जनता पार्टी ने महिला आरक्षण विधेयक के पारित न होने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि पिछले 78 वर्षों में महिला सशक्तिकरण सिर्फ भाषणों तक सीमित रहा और जब ठोस कदम उठाने का समय आया, तब कांग्रेस ने राजनीति की।
बीजेपी नेताओं ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के जरिए महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक पहल की थी। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने संकीर्ण राजनीतिक हितों के चलते इस महत्वपूर्ण विधेयक को पास नहीं होने दिया, जिससे देश की करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों को झटका लगा है।
कांग्रेस का पलटवार: ‘संविधान और लोकतंत्र की जीत’
वहीं, कांग्रेस ने बीजेपी के आरोपों को खारिज करते हुए इसे संविधान और लोकतंत्र की जीत बताया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टी. एस. सिंहदेव ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह विधेयक अगर पारित हो जाता, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।
उन्होंने लिखा, “संविधान की जीत हुई, लोकतंत्र की जीत हुई। आखिरकार इस संविधान संशोधन विधेयक का अंत हुआ।” सिंहदेव ने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसके सही और तत्काल क्रियान्वयन की पक्षधर है।
राहुल गांधी के बयान का हवाला
टी. एस. सिंहदेव ने अपने बयान में राहुल गांधी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस 2023 में सर्वसम्मति से पारित महिला आरक्षण कानून को लागू करने के पक्ष में है। पार्टी का मानना है कि महिला आरक्षण तुरंत लागू किया जाना चाहिए, लेकिन इसके नाम पर संघीय ढांचे या राज्यों के अधिकारों से समझौता नहीं होना चाहिए।
संघीय ढांचे पर बहस तेज
कांग्रेस नेताओं ने इस पूरे विवाद को सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से भी जोड़ दिया है। उनका कहना है कि किसी भी संवैधानिक संशोधन में राज्यों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
सिंहदेव ने जोर देकर कहा कि देश के किसी भी राज्य के साथ अन्याय स्वीकार नहीं किया जाएगा और संविधान की मूल भावना के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।
सियासत में बढ़ती गर्मी
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर अब संसद से लेकर राज्यों तक सियासी संग्राम तेज हो गया है। बीजेपी इसे महिला सशक्तिकरण का बड़ा कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे संवैधानिक संतुलन और संघीय ढांचे के नजरिए से देख रही है।
आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक तूल पकड़ सकता है, खासकर जब 2029 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न दल अपनी-अपनी रणनीति तय करेंगे।








