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नौकरी का झांसा, युद्ध की आग: रूस-यूक्रेन जंग में जान गंवाने वाले पूर्वांचल के युवकों के कंकाल 2 साल बाद पहुंचे घर

Russia Ukraine War: रूस-यूक्रेन युद्ध में फंसे पूर्वांचल के युवाओं की दर्दनाक कहानी एक बार फिर सामने आई है. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और मऊ जिले के कई युवक बेहतर नौकरी की तलाश में एजेंटों के झांसे में आकर वर्ष 2024 में रूस पहुंचे थे. उन्हें गार्ड और हेल्पर की नौकरी का सपना दिखाया गया था, लेकिन रूस पहुंचने के बाद कथित तौर पर उन्हें जबरन सेना की ट्रेनिंग देकर युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया. इसी दौरान दो युवकों की मौत हो गई, जिनके शरीर का अवशेष दो साल बाद उनके घर पहुंचा है.

गुरुवार को आजमगढ़ शहर के गुलामी का पूरा निवासी अजहरुद्दीन और मऊ जिले के निवासी रामचंद्र के अवशेष उनके परिजनों को सौंपे गए. दोनों लंबे समय से लापता थे. उनके शवों की पहचान डीएनए जांच के जरिए की गई, जिसके बाद रूस से उनके अवशेष भारत भेजे गए.आजमगढ़ और मऊ जिले के कई युवक जनवरी 2024 में रोजगार की तलाश में एजेंटों के संपर्क में आए थे. परिजनों का आरोप है कि मऊ निवासी एक एजेंट ने उन्हें गार्ड और हेल्पर की नौकरी का लालच देकर रूस भेजा था. वहां पहुंचने के बाद युवकों को कथित रूप से युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया. इस दौरान कई लोग घायल हुए, कुछ वापस लौट आए, जबकि कई युवक लापता हो गए.

साल 2024 में रूस गया था
अजहरुद्दीन 27 जनवरी 2024 को रूस गया था. उसके लापता होने के बाद परिवार लगातार उसकी तलाश में जुटा रहा. मृतक के भाई अजीमुद्दीन ने बताया कि वह अपने भाई की खोज में सऊदी अरब की नौकरी छोड़कर भारत और रूस के विभिन्न सरकारी कार्यालयों और दूतावासों के चक्कर लगाता रहा. लंबे प्रयासों और सरकारी मदद के बाद आखिरकार उसके भाई के अवशेष भारत लाए जा सके.

परिजनों का कहना है कि यह एक बड़े स्तर का धोखाधड़ी का मामला है, जिसमें युवाओं को नौकरी का झांसा देकर युद्ध क्षेत्र में पहुंचाया गया. उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है. साथ ही मृतकों के बकाया वेतन और अन्य वित्तीय दावों का भुगतान कराने की भी मांग उठाई है.

डीएनए से हुई पहचान
जिला प्रशासन की ओर से वाराणसी एयरपोर्ट से अवशेषों को लाकर परिजनों को सौंपने की व्यवस्था की गई. प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं. मृतक के परिजनों के अनुसार, रूस में बड़ी संख्या में युद्ध में मारे गए लोगों के शव मौजूद थे, जिनकी पहचान करना बेहद मुश्किल था. इसी कारण डीएनए नमूनों की मदद ली गई. डीएनए मिलान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अजहरुद्दीन की पहचान सुनिश्चित हो सकी और उसके अवशेष भारत भेजे गए.

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