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Breaking: पंडवानी की ‘भीष्म’ का अवसान: पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन, लोक कला की दुनिया में पसरा सन्नाटा

रायपुर: छत्तीसगढ़ की लोक कला को विश्व पटल पर गौरवपूर्ण स्थान दिलाने वाली महान पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का आज रविवार तड़के निधन हो गया है। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रही थीं और राजधानी रायपुर स्थित एम्स (AIIMS) में उनका इलाज चल रहा था।

सुबह 3:15 बजे ली अंतिम सांस

अस्पताल प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, डॉ. तीजन बाई ने आज सुबह करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

संघर्ष से शिखर तक का सफर

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का नाम जब भी दुनिया में सम्मान के साथ लिया जाता है, तो सबसे पहले जिन हस्तियों का नाम सामने आता है उनमें पद्म विभूषण डॉ. तीजनबाई प्रमुख हैं। अपनी ओजस्वी आवाज, अद्भुत अभिनय और रंग-बिरंगे तानपुरे के साथ महाभारत की कथाओं को जीवंत करने वाली तीजनबाई ने पंडवानी जैसी लोककला को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। बिना औपचारिक शिक्षा प्राप्त किए उन्होंने अपनी प्रतिभा और अथक संघर्ष के दम पर देश-विदेश में छत्तीसगढ़ की संस्कृति का परचम लहराया।

संघर्षों से भरा बचपन

डॉ. तीजनबाई का जन्म वर्ष 1956 में दुर्ग जिले (वर्तमान छत्तीसगढ़) के गनियारी गांव में पारधी समुदाय के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम चुनुकलाल (या हुनुकलाल) पारधी और माता का नाम सुखवती देवी था। बचपन में उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनीं और वहीं से पंडवानी के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ।उस दौर में महिलाओं के लिए पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था। जब तीजनबाई ने परंपरा को तोड़ते हुए मंच पर खड़े होकर अभिनय के साथ पंडवानी गाना शुरू किया, तो समाज ने उनका बहिष्कार तक कर दिया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी कला को ही जीवन का उद्देश्य बना लिया।पंडवानी में किया ऐतिहासिक बदलावपंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकगायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथाओं का गायन और अभिनय किया जाता है। पहले महिलाएं केवल बैठकर ‘वेदमती शैली’ में पंडवानी प्रस्तुत करती थीं, जबकि ‘कापालिक शैली’ में मंच पर अभिनय के साथ प्रस्तुति पुरुष कलाकार देते थे।तीजनबाई इस परंपरा को बदलने वाली पहली महिला बनीं। उन्होंने कापालिक शैली में मंच पर अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और स्वर के अद्भुत समन्वय से पंडवानी को नई पहचान दी। उनका तानपुरा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष तो कभी दुर्योधन की तलवार बन जाता है, जिससे दर्शक पूरी तरह महाभारत के दृश्य में खो जाते हैं।

तीजनबाई ने अपनी कला का प्रदर्शन भारत ही नहीं बल्कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, तुर्की सहित अनेक देशों में किया। उनकी प्रस्तुतियों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय लोककला की नई पहचान बनाई। उन्होंने साबित किया कि लोककला किसी भाषा या सीमा की मोहताज नहीं होती।सम्मान और उपलब्धियांडॉ. तीजनबाई को कला जगत में उनके असाधारण योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है।- पद्मश्री (1988)- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)- पद्म भूषण (2003)- पद्म विभूषण (2019)इसके अलावा देश-विदेश की अनेक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है और कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियों से भी अलंकृत किया है।

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