बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के श्रम विभाग में डायरेक्टर (संचालक) पद पर की गई पदोन्नति को नियम विरुद्ध करार देते हुए रद्द कर दिया है। जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू की सिंगल बेंच ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह आगामी तीन महीने के भीतर ‘रिव्यू डीपीसी’ (Review DPC) आयोजित कर नई पदोन्नति प्रक्रिया पूरी करे।
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि पदोन्नति के लिए अधिकारियों के मूल्यांकन में गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियां थीं। सेवा नियमों के अनुसार, डायरेक्टर जैसे उच्च पद के लिए अधिकारियों के पिछले 10 वर्षों के वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) का मूल्यांकन अनिवार्य था। हालांकि, विभाग ने केवल 5 वर्षों के रिकॉर्ड के आधार पर ही पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी कर ली।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू की बेंच ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए कहा “जब नियम स्पष्ट रूप से 10 वर्षों के रिकॉर्ड के मूल्यांकन की बात करते हैं, तब केवल 5 वर्षों के रिकॉर्ड के आधार पर निर्णय लेना सेवा नियमों का उल्लंघन है। ऐसी प्रक्रिया से निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रभावित होती है।”
क्या था मुख्य विवाद?
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि विभाग को “मेरिट-कम-सीनियरिटी” (योग्यता एवं वरिष्ठता) के सिद्धांत का पालन करना था, लेकिन डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) ने निर्धारित मानकों और नियम पुस्तिका को दरकिनार कर दिया। कोर्ट ने इन तर्कों को सही पाया और वर्तमान पदोन्नति आदेश को निरस्त कर दिया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट का यह फैसला राज्य के अन्य सरकारी विभागों के लिए भी एक कड़ा संदेश है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशासनिक पदों पर पदोन्नति के दौरान सेवा नियमों की अनदेखी भारी पड़ सकती है। अब राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर नए सिरे से पारदर्शिता के साथ इस प्रक्रिया को दोहराना होगा।









