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बलौदाबाजार कलेक्ट्रेट अग्निकांड: क्रांति सेना प्रमुख अमित बघेल को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, जमानत याचिका खारिज

बलौदाबाजार/बिलासपुर। 10 जून 2024 को बलौदाबाजार कलेक्ट्रेट परिसर में हुई ऐतिहासिक हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ मामले में मुख्य आरोपी और छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के प्रमुख अमित बघेल को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बहुत बड़ा झटका लगा है। माननीय उच्च न्यायालय ने अमित बघेल की जमानत याचिका को पूरी तरह से खारिज करते हुए उन्हें फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे ही रखने का फैसला सुनाया है। कोर्ट के इस कड़े रुख से अमित बघेल समेत हिंसा में शामिल अन्य आरोपियों की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ गई हैं।


भीड़ को उकसाने में केंद्रीय भूमिका, 4 अलग-अलग FIR हैं दर्ज

बलौदाबाजार सिटी कोतवाली थाने में अमित बघेल और उनके सहयोगियों के खिलाफ कुल चार अलग-अलग एफआईआर (FIR) दर्ज हैं। सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश की गई केस डायरी और पुख्ता सबूतों ने अमित बघेल की मुश्किलें बढ़ा दीं।

  • साक्ष्य: पुलिस जांच में गवाहों के बयान, घटना के वक्त के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, और कॉल डिटेल्स (CDR) शामिल हैं।
  • कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट में प्रस्तुत केस डायरी के अनुसार, कलेक्ट्रेट में आगजनी और तोड़फोड़ के दौरान अमित बघेल, अजय यादव और दिनेश कुमार वर्मा की मौके पर मौजूदगी और उग्र भीड़ को उकसाने में सक्रिय तथा केंद्रीय भूमिका (Central Role) प्रथम दृष्टया पूरी तरह साबित हुई है।

“यह सामान्य अपराध नहीं, राज्य की सुरक्षा का मामला” – हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने जमानत याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने साफ कहा कि:

“यह मामला कोई साधारण या सामान्य अपराध नहीं है। यह सीधे तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और राज्य की सुरक्षा से जुड़ा एक बेहद गंभीर मामला है। ऐसे मामलों में यूएपीए (UAPA) जैसे विशेष कानूनों के तहत जमानत देने के लिए निर्धारित वैधानिक मानदंड (Strict Statutory Criteria) लागू होंगे, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”

समानता (Parity) का दावा भी खारिज, आपराधिक इतिहास आया सामने

अमित बघेल के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी थी कि मामले के कुछ अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, इसलिए उन्हें भी ‘समानता के आधार’ पर राहत दी जाए। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने रिकॉर्ड देखते हुए कहा कि:

  • अमित बघेल के खिलाफ पहले से 17 अन्य मामले लंबित हैं।
  • अजय यादव के खिलाफ 13 अन्य मामले दर्ज हैं।
  • दिनेश कुमार वर्मा के खिलाफ 1 अन्य मामला लंबित है। ऐसे आपराधिक इतिहास को देखते हुए किसी भी तरह की समानता का लाभ नहीं दिया जा सकता।

राहत की बस एक उम्मीद: 1 साल की शर्त

हालांकि, हाईकोर्ट ने आदेश में एक छोटी सी खिड़की खुली रखी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि केस के ‘संरक्षित गवाहों’ (Protected Witnesses) की गवाही पूरी हो जाती है, या फिर इस आदेश की तारीख से 1 वर्ष की अवधि बीत जाती है, तो आरोपी दोबारा जमानत के लिए याचिका दायर कर सकेंगे।

बहरहाल, हाईकोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद बलौदाबाजार का यह पूरा हिंसा प्रकरण एक बार फिर छत्तीसगढ़ की राजनीतिक और सामाजिक फिजाओं के केंद्र में आ गया है।


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