पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सीएम पद से इस्तीफा देने से इनकार कर राज्य में संवैधानिक संकट जैसी स्थिति खड़ी कर दी है. ममता बनर्जी ने मंगलवार को कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कहा कि उनके इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता है. प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब ममता से पूछा गया कि क्या वे इस्तीफा देने के लिए राजभवन गवर्नर के पास जाएंगी.
इस प्रश्न का जवाब देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि उनके इस्तीफा देने का सवाल ही नहीं उठता है, ममता ने कहा कि नैतिक रूप से उनकी विजय हुई है. ममता ने कहा कि मैं लोकभवन जाकर इस्तीफा नहीं दूंगी. उन्होंने कहा कि पार्टी सदस्यों के साथ आगे की स्ट्रैटेजी पर चर्चा की जाएगी. मैं अब बीजेपी के अत्याचारों को और बर्दाश्त नहीं करूंगी. मैं सड़कों पर लौटूंगी. ममता ने कहा कि हमारा मुकाबला बीजेपी से नहीं था बल्कि चुनाव आयोग से था. चुनाव आयोग ने बीजेपी के लिए काम किया.
ममता का ये रुख राज्य में संवैधानिक संकट को जन्म दे सकता है. हालांकि सरकार गठन पर इसका असर नहीं पड़ेगा. वरिष्ठ वकील शेखर नाफड़े ने कहा कि अगर वह इस्तीफा देने से मना करती हैं, तो संविधान के तहत राज्यपाल उनकी सरकार को बर्खास्त कर सकते हैं, क्योंकि चुनाव आयोग ने जरूरी अधिसूचना और जनादेश जारी कर दिया है.
चुनाव नतीजों को चुनौती देने का उनका अधिकार कोई नहीं छीन सकता, लेकिन जब तक कोई सक्षम अदालत कोई आदेश नहीं दे देती, तब तक उन्हें ECI के जनादेश का पालन करना होगा.
उन्होंने कहा कि विधानसभा का 5 साल का कार्यकाल खत्म होने पर राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकते हैं. बंगाल की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को खत्म हो रहा है. आर एन रवि इस वक्त बंगाल के राज्यपाल हैं.
वरिष्ठ वकील का कहना है कि ममता का राज्यपाल से मिलकर इस्तीफा नहीं देने से कुछ नहीं बदलेगा. राज्यपाल सदन और सरकार को बर्खास्त कर सकते हैं, क्योंकि जनादेश समाप्त हो चुका है.
अगर CM इस्तीफा नहीं देती हैं या नहीं देते हैं तो राज्यपाल CM को इस्तीफा देने की सलाह दे सकते हैं. अगर CM इनकार करते हैं तो राज्यपाल CM को बर्खास्त कर सकते हैं. अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री राज्यपाल की कृपा पर ही सरकार में रह सकते हैं.
संविधान विशेषज्ञ मानते हैं कि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देंगी तो भी नई विधान सभा के गठन और नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण पर कोई असर नहीं पड़ेगा. राज्यपाल मौजूदा मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बगैर भी नई विधानसभा में नई सरकार का नया मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. कार्यकाल के बीच मुख्यमंत्री बदलने को लेकर तो संवैधानिक अड़चन है लेकिन विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने पर नई विधानसभा के गठन में कोई अड़चन नहीं है. निर्वाचन आयोग ने जिनको जीत का प्रमाण पत्र दिया है वही मान्य होगा.
संविधानविद पीडीटी आचार्य ने क्या कहा?
लोकसभा सचिवालय के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने इस मुद्दे पर कहा है कि अगर वो इस्तीफा नहीं भी देती हैं तो इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है. वैसे भी राज्यपाल ने उन्हें नए सीएम के शपथग्रहण तक कार्यवाहक सीएम का पद संभालने को कहा होता.
संवैधानिक प्रावधान कहते हैं कि पांच साल का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद एक सरकार जारी नहीं रह सकती है. अगर ममता चुनाव को चुनौती दें, तो ऐसा ‘चुनाव याचिका’ के ज़रिए ही होगा, जिसकी सुनवाई बाद में की जाएगी. ऐसा कुछ भी नहीं है जो उन्हें अपने पद पर बने रहने की अनुमति देता हो.
पीडीटी आचार्य ने कहा कि वे SIR की सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर चुनाव को चुनौती दे सकती हैं, लेकिन वह एक अलग याचिका होगी. भले ही यह कदम उठाया जाए फिर भी वह 7-8 मई के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बनी नहीं रह सकतीं.
यह सामान्य जानकारी संविधान और प्रथाओं पर आधारित है, वास्तविक स्थिति में राज्यपाल के फैसले, राजनीतिक गठबंधन और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का भी महत्व होता है.
जनादेश की पवित्रता का अपमान
बीजेपी नेता गौरव भाटिया ने आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने चुनाव हारने के बावजूद इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है. सत्ता से चिपके रहकर ममता बनर्जी न केवल अराजकतावादी रवैया अपना रही हैं, बल्कि वे मतदाताओं की भावनाओं और जनादेश की पवित्रता का भी खुलेआम अपमान कर रही हैं. यह पूरी तरह से संवैधानिक व्यवस्था का चरमराना है.










