बिलासपुर। वैवाहिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अहम टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच होने वाली सामान्य कहासुनी, विचारों का न मिलना या कभी-कभार की झड़प को ‘मानसिक क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि केवल व्यवहार से असंतोष या आपसी मतभेद तलाक का वैध आधार नहीं बन सकते। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को सही ठहराया।
मामला क्या है?
यह मामला रायपुर के एक दंपती से जुड़ा है:
- वर्ष 2014 में प्रेम विवाह: दंपती ने साल 2014 में लव मैरिज की थी और उनके दो बच्चे हैं।
- मायके जाने के बाद तलाक की अर्जी: पारिवारिक अनबन के बाद जब पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई, तो पति ने परिवार न्यायालय में तलाक की याचिका दाखिल की।
- पति के आरोप: पति का आरोप था कि पत्नी उसकी बहनों के साथ नहीं रहना चाहती, रिश्तेदारों से दुर्व्यवहार करती है और कई बार आत्महत्या की धमकी दे चुकी है। पति ने इन आधारों पर ‘मानसिक क्रूरता’ का हवाला दिया था।
हाईकोर्ट और परिवार न्यायालय का रुख
- परिवार न्यायालय का फैसला: पारिवारिक अदालत ने पाया कि पति अपने द्वारा लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए कोई पर्याप्त साक्ष्य (सबूत) पेश नहीं कर सका, जिसके चलते याचिका खारिज कर दी गई थी।
- हाईकोर्ट की मुहर: परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देने जब पति हाईकोर्ट पहुंचा, तो उच्च न्यायालय ने भी निचली अदालत के निर्णय को सही पाया।
अदालत की मुख्य टिप्पणी: हाईकोर्ट ने साफ किया कि वैवाहिक जीवन में छोटी-मोटी कहासुनी या व्यवहार संबंधी असहमति हर रिश्ते का हिस्सा हो सकती है। जब तक साक्ष्यों के आधार पर क्रूरता का कोई वैधानिक आधार सिद्ध न हो, तब तक केवल मतभेदों के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) की मंजूरी नहीं दी जा सकती।








