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सियासत की भेंट चढ़ी ममता: जगदलपुर में पांच बेटियों संग सड़क पर आई विधवा माँ, भाजपा पार्षद ने घर में जड़ा ताला

जगदलपुर। बस्तर के हृदय स्थल जगदलपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। शहीद वीर गुंडाधुर वार्ड में वर्षों से सिर छिपाने की जगह को अपना घर समझने वाली एक विधवा माँ और उसकी पांच बेटियों को अचानक बेघर कर दिया गया। जिस जमीन पर उनकी यादें और भविष्य टिका था, आज वहां ताला लटका है और यह परिवार खुले आसमान के नीचे न्याय की भीख मांग रहा है।

एक झोपड़ी, पाँच बेटियाँ और दशकों का संघर्ष

पीड़ित महिला का दर्द उसकी आँखों से बहते आंसुओं में साफ झलकता है। उसने बताया कि वह पिछले कई दशकों से महज 250 स्क्वायर फीट की नजूल जमीन पर झोपड़ी बनाकर रह रही थी। बेटियों के बड़े होने और सर के ऊपर कच्ची छत के गिरने के डर से जब उसने ईंट-पत्थर जोड़कर एक पक्का कमरा बनाने की कोशिश की, तो उसे क्या पता था कि यही उसकी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।

“हमने सालों तक यहाँ दुख-सुख काटा है। नगर निगम को टैक्स भी दिया। पर आज जब बेटियों के लिए पक्की छत चाहिए थी, तो हमसे हमारा हक ही छीन लिया गया।” – पीड़ित माँ

सियासी खींचतान में पिसा गरीब परिवार

इस मामले ने अब राजनीतिक अखाड़े का रूप ले लिया है। एक ओर भाजपा पार्षद गायत्री बघेल हैं, जिन्होंने घर के मुख्य द्वार पर ताला जड़ दिया है। उनका तर्क है कि यह जमीन इस परिवार की नहीं है और 40 वर्षों के निवास का दावा झूठा है। उनके अनुसार, यह नियम विरुद्ध कब्जा है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दूसरी ओर, पूर्व कांग्रेस पार्षद राधा बघेल इस परिवार की ढाल बनकर खड़ी हैं। उन्होंने निगम टैक्स की रसीदें दिखाते हुए प्रशासन से सवाल किया है कि अगर यह जमीन उनकी नहीं थी, तो सालों तक टैक्स क्यों लिया गया?

प्रशासन की चुप्पी: सवाल जो चुभते हैं

सबसे बड़ा सवाल जिला और नगर निगम प्रशासन पर उठता है। आखिर एक गरीब परिवार को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के इस तरह बेघर कैसे किया जा सकता है?

  • क्या नियम केवल गरीबों की झोपड़ियों के लिए हैं?
  • पांच बेटियों की सुरक्षा और भविष्य का जिम्मेदार कौन होगा?
  • क्या रसूखदारों के दावों के आगे एक विधवा की गुहार की कोई कीमत नहीं?

सड़क पर बीती रातें

आज वह माँ अपनी पांच बेटियों को अपने आंचल में समेटे शासन-प्रशासन के चक्कर काट रही है। जिस शहर में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे गूंजते हैं, उसी शहर की पांच बेटियाँ आज अपने ही घर में घुसने के लिए मोहताज हैं।

यह केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उन बेटियों के मान-सम्मान और सुरक्षा का सवाल है। देखना होगा कि क्या प्रशासन अपनी गहरी नींद से जागता है या यह परिवार राजनीति की भेंट चढ़कर दर-दर भटकने को मजबूर रहेगा।


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