उर्दू अदब की दुनिया से गुरुवार को बकरीद के दिन एक ऐसी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई, जिसने मोहब्बत, तन्हाई और जिंदगी को अपने अल्फाजों में नई पहचान दी। मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने भोपाल स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत समेत लाखों प्रशंसकों में गहरा शोक व्याप्त है।
डिमेंशिया से जूझ रहे थे
आधुनिक गजल के लोकप्रिय और प्रभावशाली शायरों में गिने जाने वाले डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) बीमारी से जूझ रहे थे। उम्र और बीमारी के असर ने उनकी याददाश्त लगभग छीन ली थी। हालत यह हो गई थी कि वे अपने करीबियों और परिचितों को भी पहचान नहीं पा रहे थे। पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उनका अधिकांश समय घर में ही बीत रहा था।
अपनी नफासत भरी शायरी और सहज भाषा के जरिए आम जिंदगी के एहसासों को गजल में ढालने वाले बशीर बद्र ने उर्दू साहित्य को नई ऊंचाई दी। उनकी रचनाओं में रिश्तों की गर्माहट, बिछड़ने का दर्द और जिंदगी की सादगी एक खास अंदाज में दिखाई देती थी। यही वजह रही कि उनकी गजलें सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि आम लोगों की जुबान तक पहुंचीं।
डॉ. बशीर बद्र के हिंदी में एक दर्जन से अधिक गजल संग्रह प्रकाशित हुए, जबकि उर्दू में उनके सात चर्चित गजल संग्रह साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। उनकी कई पंक्तियां आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं और नई पीढ़ी के शायरों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।
परिवार में उनके बेटे तैयब और पत्नी डॉ. राहत हैं। उनके निधन के साथ उर्दू शायरी का एक ऐसा दौर समाप्त हो गया, जिसने शब्दों को एहसास की सबसे खूबसूरत शक्ल दी।










