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रायपुर में PWD टेंडर घोटाला: बिना निविदा में शामिल हुए फर्म को 50 लाख का काम, सिस्टम पर उठे सवाल

रायपुर, 5 मई 2026। राजधानी रायपुर के लोक निर्माण विभाग (PWD) में एक बड़ा टेंडर घोटाला सामने आया है, जिसने सरकारी कार्यप्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि विभाग के विद्युत/यांत्रिकी (E/M) मंडल में अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से 50 लाख रुपए का टेंडर ऐसी फर्म को दे दिया गया, जिसने निविदा प्रक्रिया में हिस्सा ही नहीं लिया था।

जानकारी के अनुसार, टेंडर नंबर 152168 के तहत ‘एलईडी RGB कलर स्ट्रिप लाइट्स’ लगाने के लिए विभाग ने 50 लाख रुपए का टेंडर जारी किया था। इस निविदा में ‘श्री जी इलेक्ट्रिकल्स’ ने 6.50% कम दर के साथ सबसे कम बोली (L-1) लगाई थी, जबकि ‘श्री कृष्णा इंफ्रा डेवलपर’ 5.50% कम दर के साथ दूसरे स्थान पर रही। जांच के बाद दोनों फर्में क्वालिफाई भी हुईं और नियमानुसार एल-1 फर्म ‘श्री जी इलेक्ट्रिकल्स’ को ही काम मिलना तय था।

लेकिन टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद अचानक मामला पलट गया। ‘फॉर्च्यून अंश’ नाम की एक फर्म, जिसने निविदा में भाग ही नहीं लिया था, उसे काम सौंप दिया गया। हैरानी की बात यह है कि विभाग ने बिना किसी ठोस जांच के उस फर्म को पूरा 50 लाख रुपए का भुगतान भी कर दिया।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि निविदा दस्तावेजों में कथित तौर पर पेन से ‘मेसर्स श्री जी इलेक्ट्रिकल्स’ का नाम काटकर उसकी जगह ‘फॉर्च्यून अंश’ लिख दिया गया। इसी बदले हुए दस्तावेज के आधार पर फर्म को कार्यादेश जारी किया गया और अनुबंध क्रमांक 369 के तहत भुगतान भी कर दिया गया।

आरोप है कि तत्कालीन कार्यपालन अभियंता ने नियमों की अनदेखी करते हुए यह अनुबंध किया, जबकि तत्कालीन अधीक्षण अभियंता की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। टेंडर नोटशीट में ‘श्री जी इलेक्ट्रिकल्स’ को उद्यम रजिस्ट्रेशन के आधार पर छूट देने का उल्लेख किया गया, जबकि संबंधित दस्तावेज अपलोड ही नहीं किए गए थे। इससे दस्तावेजों में हेरफेर की आशंका और गहरा गई है।

मामले के उजागर होने के बाद विभाग के अधिकारी जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं। अधीक्षण अभियंता सुरेश धुप्पड़ ने मीडिया के सवालों पर कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है और दस्तावेज देखने के बाद ही वे कुछ कह पाएंगे।

अब इस पूरे मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
आखिर बिना निविदा में भाग लिए किसी फर्म को ठेका कैसे मिल गया?
किसके निर्देश पर नोटशीट में नाम बदला गया?
एल-1 फर्म को किस आधार पर दरकिनार किया गया?
और क्या नियमों के खिलाफ इस तरह कार्य आवंटन संभव है?

यह मामला न सिर्फ वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा करता है, बल्कि सरकारी तंत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अब देखना होगा कि इस मामले में जांच होती है या नहीं और दोषियों पर क्या कार्रवाई की जाती है।

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